Brussels News: यदि किसी देश की बिजली, अस्पताल या पूरा डेटा सिस्टम महज एक बटन दबाते ही ठप हो जाए, तो क्या होगा? तकनीक की दुनिया में इस खौफनाक व्यवस्था को ‘किल स्विच’ कहा जाता है। यूरोपीय देशों को अब यह डर सताने लगा है कि किसी बड़े संकट या युद्ध के वक्त विदेशी टेक कंपनियां उनके पूरे डिजिटल सिस्टम को एक झटके में पंगु बना सकती हैं।
दरअसल, वर्तमान में यूरोपीय देशों की पूरी तकनीक काफी हद तक अमेरिका और चीन पर निर्भर है। यूरोपीय संघ (EU) का मानना है कि विदेशी टेक कंपनियों पर उनकी अत्यधिक निर्भरता अब राष्ट्रीय सुरक्षा के लिए एक बड़ा खतरा बन चुकी है। खासकर क्लाउड कंप्यूटिंग, एआई (AI) और माइक्रोचिप्स जैसे महत्वपूर्ण सेक्टर्स में यूरोप पूरी तरह दूसरों के भरोसे चल रहा है।
यूरोपीय अधिकारियों के अनुसार, विदेशी क्लाउड कंपनियों के पास ऐसा तकनीकी नियंत्रण मौजूद है, जिससे वे आपात स्थिति या युद्ध जैसे तनाव के हालातों में यूरोप के भीतर अपनी सेवाएं अचानक बंद कर सकती हैं। इससे पूरा यूरोप एक झटके में डिजिटल ब्लैकआउट का शिकार हो सकता है, जिससे वहां की बुनियादी व्यवस्थाएं पूरी तरह चरमरा जाएंगी।
अमेरिकी ‘क्लाउड एक्ट’ ने बढ़ाई यूरोप की धड़कनें
यूरोपीय आयोग की उपाध्यक्ष हेन्ना विर्कुनेन के मुताबिक, अमेरिका का ‘क्लाउड एक्ट’ अमेरिकी सरकार को यह विशेष अधिकार देता है कि वह अपनी कंपनियों से किसी भी देश का डेटा मांग सकती है। चाहे वह संवेदनशील डेटा यूरोप के भीतर ही क्यों न रखा गया हो। अमेरिकी कानून की यही बात यूरोपीय संघ को सबसे ज्यादा असुरक्षित महसूस कराती है।
तकनीकी रूप से आत्मनिर्भर बनने की तैयारी में यूरोपीय संघ
इस गंभीर खतरे को देखते हुए यूरोप ने अब अपनी तकनीकी संप्रभुता को मजबूत करने का फैसला किया है। यूरोपीय आयोग की अध्यक्ष उर्सुला वॉन डेर लेयेन ने साफ शब्दों में कहा है कि वे उन तकनीकों के लिए दूसरों पर निर्भर नहीं रह सकते जो उनके अस्पताल, ऊर्जा ग्रिड और सार्वजनिक सेवाएं चलाती हैं। यूरोप अब अपने खुद के क्लाउड और डिजिटल ढांचे को विकसित कर रहा है।
Author: Pallavi Sharma


