Delhi News: भारत और अमेरिका के बीच द्विपक्षीय व्यापार समझौते (BTA) को लेकर इस समय बेहद संवेदनशील बातचीत चल रही है। इसी नाजुक मोड़ पर अमेरिका ने भारत समेत दुनिया के 54 देशों से आने वाले आयात पर 12.5 प्रतिशत तक अतिरिक्त टैरिफ लगाने का एक बड़ा और हैरान करने वाला प्रस्ताव पेश किया है।
अमेरिकी प्रशासन ने आधिकारिक तौर पर यह सख्त कदम जबरन मजदूरी (Forced Labour) से जुड़े मुद्दों को आधार बनाकर उठाया है। हालांकि वैश्विक व्यापार विशेषज्ञ इस अचानक हुई कार्रवाई को महज एक सामान्य जांच नहीं मान रहे हैं। इसे भारत पर रणनीतिक और राजनीतिक दबाव बनाने की नीति के रूप में देखा जा रहा है।
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (GTRI) की हालिया रिपोर्ट बताती है कि अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) का यह नया प्रस्ताव भारतीय निर्यात पर सीधे तौर पर लागू नहीं होता। जांच का मुख्य फोकस इस बात पर है कि भारत जैसे विकासशील देश तीसरे देशों से आने वाले विवादित उत्पादों पर कितना नियंत्रण रखते हैं।
मार्च 2026 में अमेरिकी प्रशासन ने शुरू की थी बड़ी जांच
अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि कार्यालय (USTR) ने मार्च 2026 में विशेष अमेरिकी कानून ‘सेक्शन 301’ के तहत दुनिया की करीब 60 प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं के खिलाफ एक बड़ी जांच शुरू की थी। इस व्यापक जांच में जबरन श्रम और औद्योगिक अतिरिक्त क्षमता (Excess Capacity) जैसे दो बेहद गंभीर आर्थिक मुद्दे शामिल थे।
इस जांच की प्रारंभिक रिपोर्ट जारी करते हुए अब अमेरिकी प्रशासन ने भारत सहित 54 देशों पर 12.5% तक अतिरिक्त आयात शुल्क लगाने की सिफारिश की है। यह नया शुल्क कपड़ों (टेक्सटाइल क्षेत्र) को छोड़कर बाकी सभी प्रमुख उत्पादों पर लागू हो सकता है। टेक्सटाइल के लिए कुछ कम शुल्क का प्रस्ताव है।
वर्तमान में अमेरिकी प्रशासन का यह नया टैरिफ प्रस्ताव केवल सार्वजनिक परामर्श और समीक्षा के दौर में है। इससे संबंधित सभी पक्षों की आपत्तियों और दलीलों को सुनने के बाद इस पर अंतिम फैसला जुलाई के महीने में आने की पूरी संभावना जताई जा रही है।
आरोप न होने के बावजूद भारत को क्यों घसीटा गया
इस पूरे व्यापारिक विवाद का सबसे हैरान करने वाला पहलू यह है कि अमेरिका ने सीधे तौर पर भारत के निर्यात पर कोई सवाल नहीं उठाया है। अमेरिका का यह बिल्कुल भी आरोप नहीं है कि भारत से जाने वाले सामानों को बनाने में किसी भी तरह की जबरन मजदूरी का इस्तेमाल किया जाता है।
इसके विपरीत अमेरिका ने सवाल उठाया है कि भारत उन उत्पादों के घरेलू आयात पर कड़ा प्रतिबंध क्यों नहीं लगाता, जो किसी तीसरे देश में जबरन श्रम से तैयार होते हैं। जीटीआरआई (GTRI) का मानना है कि अमेरिका का यह तर्क कानूनी और अंतरराष्ट्रीय व्यापार नीति के नजरिए से पूरी तरह गलत है।
आमतौर पर अमेरिकी कानून ‘सेक्शन 301’ का इस्तेमाल सिर्फ उन व्यापारिक बाधाओं को दूर करने के लिए होता है, जिनका सामना अमेरिकी कंपनियों को विदेशी बाजारों में करना पड़ता है। लेकिन इस मामले में अमेरिका सीधे तौर पर भारत की घरेलू आयात नीति को प्रभावित करने की कोशिश कर रहा है।
द्विपक्षीय व्यापार वार्ता (BTA) पर दबाव बनाने की रणनीति
व्यापारिक थिंक टैंक जीटीआरआई का स्पष्ट कहना है कि इस अमेरिकी कदम को केवल मानवाधिकार या श्रम सुधार के चश्मे से नहीं देखा जाना चाहिए। दोनों देशों के बीच काफी समय से एक अहम व्यापार समझौते पर बातचीत जारी है। ऐसे में यह प्रस्ताव भारत की मोलतोल करने की क्षमता को कमजोर कर सकता है।
आर्थिक विशेषज्ञों को आशंका है कि अगर भारत इस भारी-भरकम टैरिफ के डर से जल्दबाजी में कोई समझौता करता है, तो उसे नुकसान होगा। ऐसी स्थिति में भारत को घरेलू कृषि बाजार, डिजिटल व्यापार, सरकारी खरीद और अपनी औद्योगिक नीतियों जैसे बेहद संवेदनशील क्षेत्रों में अमेरिका को बड़ी रियायतें देनी पड़ सकती हैं।
भारत के पास कानूनी और कूटनीतिक स्तर पर क्या हैं विकल्प
ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव ने भारत सरकार को सुझाव दिया है कि उसे इस अमेरिकी प्रस्ताव का अंतरराष्ट्रीय मंचों पर कड़ा विरोध करना चाहिए। भारत यह मजबूत तर्क दे सकता है कि किसी देश की संप्रभु आयात नीति को आधार बनाकर एकतरफा टैरिफ लगाना पूरी तरह से वैश्विक नियमों के खिलाफ है।
इसके साथ ही भारत को अमेरिकी प्रशासन के सामने यह बात भी स्पष्ट रूप से रखनी होगी कि जबरन श्रम से जुड़े मामले कुछ चुनिंदा उत्पादों तक ही सीमित होते हैं। ऐसे में पूरे देश के सभी आयातों पर इतना बड़ा व्यापक टैरिफ लगाना एक बेहद अतार्किक और अनुपातहीन कदम माना जाएगा।
Author: Gaurav Malhotra


