हिमाचल पुलिस में भूचाल: बीच सड़क छीनी गई DSP की गाड़ी, वायरल चिट्ठी से DGP पर उठे गंभीर सवाल

Himachal News: हिमाचल प्रदेश पुलिस विभाग में एक नया और बड़ा विवाद सामने आया है। एचपीएस एसोसिएशन के एक वायरल पत्र ने पुलिस महानिदेशक अशोक तिवारी पर कई गंभीर आरोप लगाए हैं। पत्र में डीजीपी पर मनमानी कार्रवाई करने का सख्त दावा किया गया है। राज्य सरकार ने इस पत्र को पूरी तरह फर्जी बताया है। लेकिन पुलिस स्टेशन की जनरल डायरी के दस्तावेजों से पता चलता है कि शिमला में डीएसपी रैंक के अधिकारी की सरकारी गाड़ी सच में वापस ली गई थी।

बीच सड़क पर छीना गया सरकारी वाहन

शिमला पुलिस स्टेशन में दस मार्च को दर्ज डायरी से नई जानकारी सामने आई है। डीएसपी विजय रघुवंशी ने बताया कि उनकी सरकारी गाड़ी कसम्पटी के पास रोक ली गई थी। बड़े अधिकारियों के निर्देश पर यह वाहन बीच सड़क पर ले लिया गया। इस घटना से उन्हें भारी अपमान और मानसिक पीड़ा का सामना करना पड़ा। बिना लिखित आदेश के हुई इस कार्रवाई ने पुलिस महकमे पर कई बड़े सवाल खड़े किए हैं। इससे निचले अधिकारियों में नाराजगी बढ़ गई है।

सीनियर अफसर को लिफ्ट देना पड़ा भारी

डायरी प्रविष्टि में इस पूरी घटना के पीछे का संभावित कारण भी स्पष्ट रूप से बताया गया है। डीएसपी उस दिन अपनी नियमित ड्यूटी कर रहे थे। उन्होंने अपने सरकारी वाहन में डीआईजी रैंक के एक वरिष्ठ अधिकारी को लिफ्ट दी थी। पुलिस महकमे में माना जा रहा है कि इसी कदम की वजह से यह विवाद शुरू हुआ। डीएसपी ने राज्य के मुख्य सचिव और गृह विभाग को ज्ञापन सौंपकर इस कार्रवाई को पूरी तरह से मनमाना और गलत बताया है।

अवसाद में अधिकारी और तबादले का खेल

न्यूज़ एजेंसी से बातचीत में डीएसपी ने अपनी मानसिक स्थिति की जानकारी दी। उन्होंने बताया कि अपमान ने उन्हें सदमे में डाल दिया है। चोट लगने के कारण वे फिलहाल चिकित्सा अवकाश पर हैं। इस मामले में एक हैरान करने वाली बात सामने आई है। जिस पुलिसकर्मी ने थाने में डायरी दर्ज की थी, उसका तीन सौ किलोमीटर दूर तबादला कर दिया गया है। इस कड़े कदम ने प्रशासन की मंशा पर कई गंभीर सवाल खड़े किए हैं।

सरकार और डीजीपी की तरफ से सफाई

विवाद बढ़ने पर मुख्य सचिव संजय गुप्ता ने वायरल पत्र को फर्जी करार दिया है। उन्होंने बताया कि अधिकारियों की ऐसी कोई बैठक नहीं हुई थी। हालांकि, उन्होंने पुलिस थाने की डायरी पर कोई जवाब नहीं दिया। उधर, डीजीपी अशोक तिवारी ने भी इस दस्तावेज़ से किनारा कर लिया है। उन्होंने कहा कि पत्र की भाषा अधिकारियों जैसी नहीं लगती है। मुख्यमंत्री के मीडिया सलाहकार ने भी बिना ठोस सबूत के इस मुद्दे पर बोलने से पूरी तरह इनकार किया है।

पहले भी सामने आ चुके हैं ऐसे मामले

राज्य में इस तरह का यह कोई पहला विवाद नहीं है। इसी साल की शुरुआत में एक मंत्री से जुड़े विवाद के दौरान भी ऐसे ही पत्र सामने आए थे। उस समय आईएएस और आईपीएस संगठनों के नाम से कई संदेश सोशल मीडिया पर वायरल हुए थे। फर्जी दस्तावेजों के बढ़ते चलन ने सरकार की चिंता काफी बढ़ा दी है। इस ताज़ा घटनाक्रम ने पुलिस विभाग की कार्यशैली, पारदर्शिता और अधिकारियों के मनोबल को लेकर एक नई बहस छेड़ दी है।

प्रशासनिक ढांचे पर उठ रहे गंभीर सवाल

इस विवाद के बाद पुलिस प्रशासन के कामकाज पर उंगलियां उठने लगी हैं। एक वरिष्ठ अधिकारी की गाड़ी बीच सड़क पर छीन लेना सामान्य बात नहीं है। राज्य में कानून व्यवस्था बनाए रखने वाले महकमे में ही इस तरह का टकराव काफी चिंताजनक है। आम जनता भी पुलिस के इस आंतरिक कलह को लेकर हैरान है। जानकारों का मानना है कि ऐसे मामलों को समय रहते सुलझाया जाना चाहिए। इससे पुलिस बल की छवि खराब होती है और भरोसा टूटता है।

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