Delhi News: हिमाचल प्रदेश के मुख्यमंत्री सुखविन्द्र सिंह सुक्खू 11 जून को दिल्ली के भारत मंडपम में होने वाली नीति आयोग की बैठक में शामिल होंगे। इस महत्वपूर्ण बैठक में वह राज्य के वित्तीय हक के लिए बड़ी लड़ाई लड़ेंगे। राजस्व घाटा अनुदान (आरडीजी) बंद होने से हिमाचल इस समय गहरे आर्थिक संकट में है।
आरडीजी समाप्त होने के कारण हिमाचल प्रदेश को हर साल 6,258 करोड़ रुपये का भारी नुकसान हो रहा है। इस कारण राज्य का बजट घाटा 10 हजार करोड़ रुपये के पार पहुंचने की आशंका है। इस वित्तीय संकट से प्रदेश के 2.25 लाख कर्मचारियों और पेंशनर्स की अदायगी पर बड़ा खतरा मंडरा रहा है।
प्रधानमंत्री नरेन्द्र मोदी की अध्यक्षता में होने वाली इस बैठक में मुख्यमंत्री सुक्खू के साथ मुख्य सचिव केके पंत और सचिव राकेश कंवर भी मौजूद रहेंगे। मुख्यमंत्री बैठक के दौरान केंद्र सरकार के सामने चार सूत्रीय एजेंडा रखेंगे। वह हिमाचल के हितों को मजबूती से बोर्ड के सामने उठाएंगे।
हिमाचल की मुख्य मांगें क्या हैं?
मुख्यमंत्री की मुख्य मांग है कि आरडीजी सहायता को साल 2028 तक बढ़ाया जाए। अगर ऐसा नहीं होता है, तो केंद्र सरकार राज्य को 20 हजार करोड़ रुपये का विशेष पैकेज दे। इसके अलावा वर्ष 2023 की प्राकृतिक आपदा और बाढ़ से हुए नुकसान के 9042 करोड़ रुपये तुरंत जारी किए जाएं।
मुख्यमंत्री सुक्खू बीबीएमबी से मिलने वाले 4,200 करोड़ रुपये के बकाया एरियर का भुगतान भी तुरंत सुनिश्चित करने की मांग करेंगे। इसके लिए केंद्र सरकार पंजाब, हरियाणा, राजस्थान और दिल्ली को सख्त निर्देश जारी करे। पिछले साल भी नीति आयोग की बैठक में मुख्यमंत्री ने यह मुद्दा उठाया था।
68 फीसदी जंगल के बदले ग्रीन बोनस
हिमाचल प्रदेश के कुल भूभाग का 68 प्रतिशत हिस्सा वन क्षेत्र है। देश की कुल वन भूमि का 7.32 प्रतिशत भाग इसी राज्य में आता है। सरकार का तर्क है कि वन संरक्षण अधिनियम के कारण राज्य के हाइड्रो प्रोजेक्ट, फोरलेन और टूरिज्म से जुड़े प्रोजेक्ट अक्सर मंजूरी के लिए फंस जाते हैं।
इस बड़े नुकसान की भरपाई के लिए राज्य सरकार इकोसिस्टम सर्विस पेमेंट के तहत हर साल एक हजार करोड़ रुपये के ग्रीन बोनस की मांग कर रही है। 16वें वित्तायोग द्वारा राजस्व घाटा अनुदान सहायता बंद करने के बाद से हिमाचल के विकास कार्यों पर बहुत बुरा असर पड़ा है।
Author: Harish Rawat


