कांगड़ा में प्रकृति से खिलवाड़! राधा स्वामी सत्संग ने बिना अनुमति पहाड़ काटकर जलस्रोतों में भरा मलबा, क्या 5000 के जुर्माने से बचेगा पर्यावरण?

Himachal News: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले में पर्यावरणीय नियमों की धज्जियां उड़ाने का एक सनसनीखेज मामला सामने आया है। राधा स्वामी सत्संग ब्यास, परौर द्वारा किए जा रहे विस्तार कार्यों में गंभीर अनियमितताएं पाई गई हैं। हिमाचल प्रदेश राज्य प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड ने 25 अप्रैल 2026 को नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल (एनजीटी) में अपनी रिपोर्ट सौंपी। इसमें खुलासा हुआ कि बिना किसी वैधानिक अनुमति के बड़े पैमाने पर पहाड़ों की कटाई की गई। इस अवैध निर्माण ने स्थानीय जलस्रोतों और पारिस्थितिकी तंत्र को भारी नुकसान पहुंचाया है।

जलस्रोतों पर मलबे का कब्जा और उपग्रह से मिली चेतावनी

प्रदूषण नियंत्रण बोर्ड और संयुक्त समिति की जांच में चौंकाने वाले तथ्य उजागर हुए हैं। पहाड़ों की कटाई से निकला मलबा सीधे ताहल खड्ड और शी नाले जैसे जलस्रोतों में डाला गया। उपग्रह से प्राप्त तस्वीरों ने पुष्टि की है कि मलबे के कारण प्राकृतिक जलधाराओं की दिशा बदलने की कोशिश हुई। जांचकर्ताओं ने पाया कि निर्माण के दौरान निकला कचरा नालों के किनारों पर जमा हो गया है। यह लापरवाही न केवल प्रदूषण बढ़ा रही है, बल्कि भविष्य में बाढ़ जैसी आपदाओं का खतरा भी पैदा कर रही है।

कमजोर सुरक्षा दीवारें और मानसून का बढ़ता खतरा

अप्रैल 2026 में हुए दोबारा निरीक्षण में सुरक्षा इंतजामों की पोल खुल गई। रिपोर्ट के अनुसार, खड्ड और नालों के किनारे बनाई गई सुरक्षा दीवारें बेहद कमजोर हैं। विशेषज्ञों ने चेतावनी दी है कि मानसून के दौरान ये दीवारें मलबे का दबाव नहीं झेल पाएंगी। ऐसे में बरसात का पानी मलबे को बहाकर आगे की जलधाराओं को बुरी तरह प्रदूषित कर सकता है। बोर्ड ने संगठन को इन दीवारों को मजबूत करने और पूरे प्रभावित क्षेत्र की बहाली के लिए ठोस योजना पेश करने के निर्देश दिए हैं।

टाउन प्लानिंग विभाग की अनुमति को भी किया दरकिनार

पर्यावरणीय अपराध के साथ-साथ यह प्रशासनिक नियमों के उल्लंघन का भी बड़ा मामला है। पालमपुर के सब डिविजनल टाउन प्लानिंग विभाग ने स्पष्ट किया है कि निर्माण के लिए कोई अनुमति नहीं ली गई थी। विभाग ने संगठन को कई बार चेतावनी पत्र भेजे थे, लेकिन खुदाई और निर्माण कार्य बेखौफ जारी रहा। 27 फरवरी 2026 को एनजीटी द्वारा मांगे गए दस्तावेजों में भी संगठन कोई पुख्ता मंजूरी पेश नहीं कर सका। यह सरकारी तंत्र की प्रभावशीलता और संगठन की मनमानी पर गंभीर सवालिया निशान लगाता है।

35 पेड़ों की हत्या और 5000 का ‘मजाक’ जैसा जुर्माना

इस पूरे मामले का सबसे विचलित करने वाला हिस्सा पेड़ों की अवैध कटाई है। रिपोर्ट के मुताबिक, विस्तार कार्यों के लिए 35 पेड़ों को काट दिया गया। हैरानी की बात यह है कि इस गंभीर उल्लंघन के बदले महज 5,000 रुपये का जुर्माना लगाया गया। लकड़ी की वास्तविक कीमत और पर्यावरणीय क्षति की तुलना में यह जुर्माना नगण्य है। यह कार्रवाई दर्शाती है कि नियमों को तोड़ना कितना सस्ता हो गया है। अब सभी की निगाहें एनजीटी पर टिकी हैं कि क्या प्रकृति के दोषियों पर कड़ी कार्रवाई होगी।

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