Historic Forts At Risk: बिलासपुर के बच्छरेटू और ऊना के सोलासिंघी किले पर मंडराया संकट, क्या इतिहास हो जाएगा जमींदोज?

Bilaspur Heritage News: हिमाचल प्रदेश के बिलासपुर और ऊना जिलों में स्थित ऐतिहासिक धरोहरें इन दिनों सरकारी उपेक्षा और प्राकृतिक आपदाओं के कारण अपने अस्तित्व की जंग लड़ रही हैं। स्वतंत्रता-पूर्व की रणनीतियों के प्रतीक बिलासपुर के बच्छरेटू किले और ऊना के सोलासिंघी किले की हालत दिन-ब-दिन जर्जर होती जा रही है।

विश्व धरोहर फाउंडेशन के अध्यक्ष और प्रसिद्ध विरासत विशेषज्ञ डॉ. पीसी शर्मा ने इस स्थिति पर गहरी चिंता व्यक्त की है। उन्होंने स्पष्ट किया कि ये इमारतें कोई भव्य राजमहल नहीं थीं, बल्कि दुश्मनों पर पैनी नजर रखने और सीमाओं की रक्षा के लिए बनाए गए बेहद महत्वपूर्ण सामरिक दुर्ग थे।

प्राकृतिक आपदाओं से किलों को भारी नुकसान

कभी मजबूत पत्थरों की नक्काशी और बेहतरीन जल संरक्षण प्रणाली के लिए पहचाने जाने वाले ये किले आज प्रकृति की मार झेल रहे हैं। भूस्खलन, बादल फटने, जंगलों की आग और लगातार आने वाले भूकंप के झटकों के कारण इन ऐतिहासिक किलों की दीवारें अब धीरे-धीरे कमजोर होकर ढहने लगी हैं।

14वीं सदी में समुद्र तल से करीब 3000 फुट की ऊंचाई पर आयताकार आकार में बनाया गया बच्छरेटू किला आज भी अपने भीतर गौरवशाली इतिहास के अवशेष संजोए हुए है। यहाँ से गोबिंद सागर झील का बेहद खूबसूरत नजारा दिखता है। वहीं, ऊना के कुटलैहड़ में स्थित सोलासिंघी किले की रक्षात्मक दीवारें अब जमींदोज होने की कगार पर हैं।

जीर्णोद्धार के लिए एएसआई से लगाई गुहार

इन अनमोल विरासतों को विलुप्त होने से बचाने के लिए डॉ. शर्मा ने भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (ASI) और राज्य भाषा, कला व संस्कृति विभाग से तत्काल कदम उठाने की मांग की है। उन्होंने आग्रह किया है कि इन स्थलों के लिए एक विशेष विरासत संरक्षण कार्यक्रम की शुरुआत की जाए।

उन्होंने प्राथमिकता के आधार पर किलों की दीवारों और परिसरों में उगी झाड़ियों व पेड़ों की गहरी जड़ों को हटाने का सुझाव दिया है। इसके साथ ही किलों के भीतर बने प्राचीन जलाशयों, पारंपरिक बावड़ियों और वर्षा जल संचयन प्रणालियों की मरम्मत कर उन्हें दोबारा क्रियाशील बनाने की आवश्यकता पर बल दिया है।

पर्यटन सर्किट से जोड़ने की अनूठी पहल

ऐतिहासिक धरोहरों की तस्वीर बदलने के लिए डॉ. शर्मा ने एक बेहतरीन फॉर्मूला सुझाया है। उन्होंने कहा कि इन किलों को राज्य के मुख्य पर्यटन सर्किट से जोड़ा जाना चाहिए। इसके माध्यम से ग्रामीण क्षेत्रों में सामुदायिक होम स्टे, गाइडेड ट्रैकिंग रूट और स्थानीय हस्तशिल्प को बड़े पैमाने पर बढ़ावा दिया जा सकता है।

इस कदम से न केवल पर्यटकों की आवाजाही बढ़ेगी, बल्कि स्थानीय ग्रामीण अर्थव्यवस्था को भी एक नई मजबूती मिलेगी। उन्होंने किलों की देखरेख के लिए स्थानीय युवाओं और निवासियों का एक विशेष ‘फ्रेंड्स ऑफ हेरिटेज’ समूह बनाने की वकालत की है, ताकि समाज अपनी ऐतिहासिक धरोहरों के संरक्षण में अपनी सीधी भागीदारी सुनिश्चित कर सके।

Author: Sunita Gupta

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