बेटे की चाहत और घिनौने खेल पर सुप्रीम कोर्ट सख्त, कहा- सोच बदलने तक कड़े कानून की ढाल बेहद जरूरी

New Delhi News: सदियों से चली आ रही पितृसत्तात्मक सोच ने हमारे समाज को जकड़ रखा है। ‘बेटे की चाहत’ के कारण आज भी बेटियों को दुनिया में आने के लिए कड़ा संघर्ष करना पड़ रहा है। सुप्रीम कोर्ट ने लिंग चयन के घिनौने खेल पर गहरी चिंता जताई है।

सर्वोच्च न्यायालय ने कहा कि जब तक समाज की संकुचित मानसिकता में बदलाव नहीं आता, तब तक पीसीपीएएनडीटी (PCPNDT) अधिनियम को बेहद सख्ती से लागू करना अनिवार्य है। यह अधिनियम 1994 में पारित एक केंद्रीय कानून है, जिसका मुख्य उद्देश्य कन्या भ्रूण हत्या को रोकना है।

यह महत्वपूर्ण कानून प्रसव से पूर्व लिंग की जांच पर पूरी तरह प्रतिबंध लगाता है। देश में लगातार घटते लिंगानुपात में सुधार करना भी इसका मुख्य लक्ष्य है। जस्टिस संजय करोल और जस्टिस प्रशांत कुमार मिश्रा की पीठ ने एक डॉक्टर की याचिका खारिज करते हुए यह कड़ा संदेश दिया।

आजादी के पचहत्तर साल बाद भी विज्ञापनों के भरोसे बेटियों की सुरक्षा

देश की शीर्ष अदालत ने कड़वी हकीकत बयां करते हुए हमारी पूरी व्यवस्था को आईना दिखाया है। कोर्ट ने साफ कहा कि आज भले ही देश की राजधानी दिल्ली की बसों पर ‘बेटी बचाओ, बेटी पढ़ाओ’ और ‘लाडली लक्ष्मी योजना’ जैसे विज्ञापन दिखते हों, लेकिन जमीनी हकीकत अलग है।

हम आज भी अपनी मासूम बेटियों को उनका बुनियादी हक देने के लिए लगातार संघर्ष कर रहे हैं। आजादी के 75 से अधिक वर्षों के बाद भी अगर हमें बेटियों की सुरक्षा और शिक्षा के लिए सरकारी पोस्टरों का सहारा लेना पड़ रहा है, तो यह बहुत गंभीर विषय है।

सर्वोच्च न्यायालय ने जनगणना के बेहद चिंताजनक और डरावने आंकड़ों का हवाला भी दिया। कोर्ट ने याद दिलाया कि देश में बाल लिंगानुपात साल 1991 में 945 था। यह साल 2001 में घटकर 927 और साल 2011 में महज 919 रह गया। यह बड़ी गिरावट है।

रूढ़िवादिता के खिलाफ कड़े कानूनों की ढाल बनी रहेगी सबसे जरूरी

यह लगातार गिरता हुआ आंकड़ा इस बात का सीधा सबूत है कि हमारी व्यवस्था के भीतर कितनी गहरी रूढ़िवादिता छिपी है। हालांकि सरकारों के प्रयासों से हाल के दिनों में कुछ आंशिक सुधार जरूर हुआ है, लेकिन कई राज्यों में लिंगानुपात राष्ट्रीय औसत से काफी नीचे है।

कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब तक समाज महिलाओं की कमजोरी की सोच को नहीं छोड़ देता, तब तक ऐसे कड़े कानूनों की ढाल बहुत जरूरी है। एक दिन ऐसा सवेरा जरूर आएगा, जब समाज में किसी मासूम बेटी के जन्म लेने के अधिकार पर सवाल नहीं उठेगा।

सुप्रीम कोर्ट ने सुभद्रा कुमारी चौहान की प्रसिद्ध कविता ‘बालिका का परिचय’ की पंक्तियों को भी याद किया, जो एक बेटी के जन्म पर मां के असीम आनंद को दर्शाती हैं। इसके साथ ही मनुस्मृति के श्लोक का उल्लेख करते हुए बेटियों को समाज का गौरव मानने की बात कही।

Author: Adv Anuradha Rajput

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