Delhi News: महाभारत की कहानी में शकुनी को सबसे बड़ा खलनायक माना जाता है। लोग अक्सर उसे सिर्फ एक दुष्ट और कपटी इंसान ही समझते हैं। लेकिन इतिहास के पन्नों में छिपी सच्चाई इससे बहुत अलग है। शकुनी का उठाया हर कदम वास्तव में एक गहरे और भयानक बदले की भावना से जुड़ा हुआ था।
गांधार साम्राज्य के अपमान की जलती आग
शकुनी गांधार देश के बेहद सम्मानित राजकुमार थे। उनकी बहन गांधारी का विवाह हस्तिनापुर के जन्मांध राजा धृतराष्ट्र से हुआ था। इस जबरन विवाह से शकुनी का पूरा परिवार बिल्कुल खुश नहीं था। गांधार के लोग इसे अपने पूरे देश का बहुत बड़ा अपमान मानते थे। इसी अपमान का बदला लेने की कसम शकुनी ने खाई थी।
भीष्म पितामह ने गांधार देश पर भारी सैन्य दबाव बनाकर यह शादी करवाई थी। इसी वजह से शकुनी के मन में भीष्म और पूरे हस्तिनापुर के प्रति गहरी नफरत पैदा हो गई थी। एक पुरानी कथा के अनुसार हस्तिनापुर की सेना ने गांधार पर हमला कर दिया था। उस भीषण युद्ध में शकुनी के पिता और भाइयों को बंदी बना लिया गया था।
जेल की वो खौफनाक रात और पिता का संकल्प
कथा के अनुसार जेल में गांधार के राजपरिवार को बहुत ही कम खाना दिया जाता था। शकुनी के पिता ने तब एक बड़ा फैसला किया। उन्होंने तय किया कि वे अपने हिस्से का सारा भोजन शकुनी को देंगे। ताकि वह किसी तरह जीवित रह सके और हस्तिनापुर के कुरुवंश से इस घोर अत्याचार का पूरा बदला ले सके।
पिता की दर्दनाक मृत्यु के बाद शकुनी के मन में केवल प्रतिशोध की आग बची थी। वह किसी भी कीमत पर हस्तिनापुर के विशाल साम्राज्य को पूरी तरह मिट्टी में मिलाना चाहता था। अपने इस गुप्त मकसद को पूरा करने के लिए शकुनी ने हमेशा के लिए हस्तिनापुर में ही अपना स्थायी डेरा डाल लिया था।
भांजे दुर्योधन को बनाया प्रतिशोध का मोहरा
शकुनी ने धृतराष्ट्र और गांधारी के बच्चों का प्रिय मामा बनकर उनका पूरा विश्वास जीता। उसने सबसे पहले दुर्योधन को अपना मुख्य मोहरा बनाया। उसने दुर्योधन के कोमल मन में बचपन से ही पांडवों के खिलाफ नफरत का जहर भरना शुरू कर दिया। वह जानता था कि सीधे युद्ध में हस्तिनापुर को हराना नामुमकिन है।
इसीलिए चतुर शकुनी ने कूटनीति और भयानक षड्यंत्र का सहारा लिया। उसने दुर्योधन के मन में छिपी ईर्ष्या को लगातार हवा दी। इसी वजह से कौरवों और पांडवों के बीच दूरियां बहुत बढ़ती चली गईं। शकुनी की चालों ने अंततः भाई को भाई का सबसे बड़ा और जानी दुश्मन बना दिया।
हड्डियों के पासे और चौपड़ का वो खेल
शकुनी पासे फेंकने की गुप्त कला में बहुत माहिर था। उसके पास जो पासे थे, वे उसके मृत पिता की हड्डियों से बने थे। वे पासे हमेशा शकुनी की हर बात मानते थे। उसने इसी कला का इस्तेमाल द्युत क्रीड़ा यानी चौपड़ के खेल में पांडवों के खिलाफ बहुत चालाकी से किया था।
उसने पांडवों को इस खेल में हराकर उनका राजपाठ और सब कुछ छीन लिया। यहां तक कि भरी सभा में द्रौपदी का घोर अपमान भी उसी खेल की वजह से हुआ था। शकुनी अच्छे से जानता था कि आत्मस्मानी पांडव इस अपमान को कभी नहीं भूलेंगे। वह जानबूझकर युद्ध के हालात पैदा कर रहा था।
कुरुक्षेत्र में कुरुवंश का पूरी तरह सर्वनाश
कुरुक्षेत्र का महायुद्ध शकुनी की इसी खतरनाक कूटनीति का अंतिम परिणाम था। इस महायुद्ध में कौरवों के पूरे वंश का समूल नाश हो गया। भीष्म पितामह, द्रोणाचार्य और दुर्योधन जैसे शक्तिशाली योद्धा मारे गए। अंत में पांडवों के हाथों शकुनी का भी अंत हुआ। लेकिन मरने से पहले उसने अपना संकल्प पूरा कर लिया था।
Pandit Balkrishan Sharma


