Bengaluru News: सनातन धर्म में नदियों को देवी और मां का दर्जा दिया गया है। उत्तर भारत में जो स्थान गंगा नदी का है, वही महत्व दक्षिण भारत में कावेरी नदी का माना जाता है। शास्त्रों के अनुसार, इस पवित्र नदी की उत्पत्ति की पौराणिक कथा भगवान गणेश और ऋषि अगस्त्य से जुड़ी है, जो बहुत ही दिलचस्प है।
कैलाश का संतुलन बनाने दक्षिण दिशा में गए ऋषि अगस्त्य
पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान शिव और माता पार्वती के विवाह के समय सभी देवता और ऋषि कैलाश पर्वत पर पहुंचे थे। इससे उत्तर दिशा का वजन काफी बढ़ गया और भूमि का संतुलन बिगड़ गया। तब महादेव ने संतुलन बनाने के लिए अगस्त्य ऋषि को दक्षिण भेजा और उनके कमंडल में कावेरी को स्थापित कर दिया।
जब असुर के आतंक से धरती पर रुक गई थी बारिश
ऋषि अगस्त्य जब दक्षिण पहुंचे, तो उसी समय वहां असुर सुरपद्म का आतंक बहुत बढ़ गया था। राक्षस के अत्याचार के कारण दक्षिण क्षेत्र में वर्षा पूरी तरह रुक गई, जिससे भयंकर सूखा पड़ गया। चारों तरफ पानी की भारी कमी होने के कारण देवताओं के राजा इंद्र और आम जनता बेहद परेशान हो उठी।
देवराज इंद्र की चिंता और भगवान गणेश से मांगी मदद
देवराज इंद्र को देवर्षि नारद से पता चला कि कावेरी का पवित्र जल ऋषि अगस्त्य के कमंडल में बंद है। देवताओं को चिंता हुई कि यदि यह जल बाहर नहीं आया, तो संसार का कल्याण कैसे होगा। इस विकट समस्या के समाधान के लिए सभी देवता भगवान गणेश की शरण में पहुंचे और उनसे सहायता की प्रार्थना की।
भगवान गणेश ने धारण किया कौए का अद्भुत रूप
देवताओं की प्रार्थना सुनकर भगवान गणेश ने एक कौए का रूप धारण किया। वह उड़ते हुए ऋषि अगस्त्य के पास पहुंचे, जो उस समय ध्यान में मग्न थे। भगवान गणेश ऋषि के पास रखे उस विशेष कमंडल के ऊपर जाकर बैठ गए, जिसमें कावेरी नदी का पवित्र जल सुरक्षित रूप से भरा हुआ था।
कमंडल गिरने से हुआ पवित्र कावेरी नदी का उद्गम
ऋषि अगस्त्य ने कमंडल पर बैठे कौए को हटाने की कोशिश की, जिससे संतुलन बिगड़ा और कमंडल जमीन पर गिर गया। कमंडल गिरते ही उसका सारा दिव्य जल बहने लगा और इस तरह कावेरी नदी का उद्गम हुआ। बाद में ऋषि अगस्त्य को ज्ञात हुआ कि वह साधारण कौआ कोई और नहीं बल्कि स्वयं गणेश जी थे।
स्कंद पुराण में वर्णित है दक्षिण की गंगा का महत्व
कावेरी नदी के इस पावन इतिहास का पूरा वर्णन स्कंद पुराण के ‘कावेरी माहात्म्य’ खंड में विस्तार से मिलता है। इसके अलावा श्रीमद्भागवत पुराण के पंचम स्कंध में भी इसकी महिमा बताई गई है। अपनी परम पवित्रता और धार्मिक महत्व के कारण ही इस लाइफलाइन नदी को ‘दक्षिण की गंगा’ कहा जाता है।

