क्या आप भी महीनों पुराना सेब खा रहे हैं? जानिए कोल्ड स्टोरेज का पूरा गणित और सेहत पर इसका असर

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India News: भारतीय बाजारों में गर्मी के मौसम में मिलने वाले सेब असल में आठ से दस महीने पुराने होते हैं। भारत की भौगोलिक स्थिति के कारण यहाँ सेब की मुख्य पैदावार केवल अगस्त से अक्टूबर के बीच होती है। इसके बाद साल भर बाजारों में कोल्ड स्टोरेज में रखे गए सेब ही बेचे जाते हैं।

दक्षिण भारत के नीलगिरि क्षेत्र में बेहद सीमित मात्रा में अप्रैल से जुलाई के बीच सेब पैदा होते हैं। हालांकि यह पैदावार इतनी कम होती है कि बड़े बाजारों तक नहीं पहुंच पाती है। इसका सीधा मतलब है कि देश में केवल अगस्त से नवंबर के बीच ही पूरी तरह ताजा सेब मिलता है।

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विशेष कोल्ड स्टोरेज में सेब को सुलाने की तकनीक

अक्टूबर के बाद बाजारों में सेब की निरंतर सप्लाई बनाए रखने के लिए वैज्ञानिक तकनीक का सहारा लिया जाता है। इन विशेष कोल्ड स्टोरेज में केवल तापमान ही कम नहीं किया जाता है। वहाँ हवा में ऑक्सीजन का स्तर घटाकर नाइट्रोजन और कार्बन डाइऑक्साइड को वैज्ञानिक तरीके से बढ़ाया जाता है।

इस नियंत्रित वातावरण के कारण सेब के सांस लेने की प्राकृतिक प्रक्रिया बेहद धीमी हो जाती है। इससे फल का पकना और सड़ना पूरी तरह रुक जाता है। सेब एक तरह से गहरी नींद या कोमा जैसी स्थिति में चला जाता है। इसी वजह से फल लंबे समय तक कड़े रहते हैं।

नमी को बचाने के लिए की जाती है वैक्सिंग

लंबे समय तक फल को ताजा रखने के लिए उस पर खाद्य-ग्रेड मोम की पतली परत चढ़ाई जाती है। यह परत सेब की प्राकृतिक नमी को अंदर ही रोक कर रखती है। इससे फल सूखता या सिकुड़ता नहीं है और बाजार में इसकी चमक हमेशा नए फल जैसी बनी रहती है।

पुराने सेब का मानव सेहत पर वास्तविक असर

महीनों तक स्टोर करके रखने से सेब के विटामिन्स और एंटीऑक्सीडेंट्स में थोड़ी कमी जरूर आती है। हालांकि इसका स्वास्थ्यवर्धक डाइजेस्टिव फाइबर, कार्बोहाइड्रेट और जरूरी मिनरल्स पूरी तरह सुरक्षित रहते हैं। खाने से पहले सेब को हमेशा गुनगुने पानी से अच्छी तरह धोना चाहिए ताकि वैक्स साफ हो सके।

विशेषज्ञों के मुताबिक कोल्ड स्टोरेज वाले सेब में पोटैशियम और आयरन जैसे मिनरल्स शत-प्रतिशत सुरक्षित रहते हैं। यह शरीर में ब्लड प्रेशर को नियंत्रित रखने और दिल की सेहत के लिए बहुत फायदेमंद होता है। इसकी प्राकृतिक शुगर और एनर्जी पर समय का कोई बुरा असर नहीं पड़ता है।

विदेशी सेब की सच्चाई और आयात का पूरा गणित

यदि आप गर्मियों में ताजा सेब खाना चाहते हैं, तो विदेशी सेब एक अच्छा विकल्प हैं। मार्च से मई के दौरान न्यूजीलैंड, चिली और ऑस्ट्रेलिया जैसे देशों में सेब का ताजा सीजन होता है। समुद्र के रास्ते रीफर कंटेनर्स में चलते-फिरते कोल्ड स्टोरेज के जरिए ये भारत पहुंचते हैं।

पेड़ से टूटने के बाद भारत के खुदरा बाजार तक पहुंचने में विदेशी सेब को करीब 35 से 45 दिन का समय लगता है। इन कंटेनरों में भी तापमान और ऑक्सीजन को नियंत्रित रखा जाता है। यह स्थानीय कोल्ड स्टोरेज वाले सेबों की तुलना में काफी महंगे होते हैं।

बाजार के अन्य फलों की शेल्फ लाइफ की हकीकत

सेब के विपरीत बाजार में मिलने वाले अधिकांश अन्य फल ज्यादा पुराने नहीं होते हैं। केला, पपीता, तरबूज, अंगूर, जामुन और आम जैसे फलों को महीनों तक स्टोर करना नामुमकिन है। ये पेड़ से टूटने के बाद अधिकतम 3 से 10 दिनों के भीतर आपके घर तक पहुंच जाते हैं।

सेब के अलावा केवल नाशपाती, संतरा, किन्नू, अनार और कीवी जैसे मोटे छिलके वाले फल ही कोल्ड स्टोरेज का दबाव झेल सकते हैं। ये फल कोल्ड स्टोरेज में दो से तीन महीने तक सुरक्षित रह सकते हैं। वहीं कीवी को विशेष तापमान पर छह महीने तक स्टोर किया जा सकता है।

सेब के पौधे का प्राकृतिक और सुंदर लाइफ साइकल

भारत में सेब के पेड़ का लाइफ साइकल पूरी तरह प्रकृति के नियमों से बंधा हुआ है। सर्दियों में दिसंबर से फरवरी तक पेड़ पूरी तरह पत्ती-विहीन होकर सुप्तावस्था में चला जाता है। इस समय पेड़ को अगली फसल के लिए खुद को रिचार्ज करने की जरूरत होती है।

वसंत आते ही मार्च-अप्रैल में पेड़ पर खूबसूरत गुलाबी फूल खिलते हैं, जहाँ मधुमक्खियां परागण का काम करती हैं। इसके बाद मई से जुलाई के बीच छोटे हरे दाने धूप पाकर बड़े होने लगते हैं। फूल आने के करीब पांच महीने बाद अगस्त में फसल तुड़ाई के लिए तैयार हो जाती है।

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