Shimla Court News: हिमाचल प्रदेश में सड़क चौड़ीकरण के कारण काटे गए फलदार पेड़ों के उचित मुआवजे को लेकर चल रहे लंबे कानूनी संघर्ष में स्थानीय बागवानों की बड़ी जीत हुई है। शिमला की एक जिला अदालत ने लोक निर्माण विभाग को पीड़ित बागवानों को तुरंत भारी मुआवजा राशि जारी करने का कड़ा आदेश दिया है।
अतिरिक्त जिला न्यायाधीश-एक प्रवीण गर्ग की अदालत ने मामले की सुनवाई करते हुए विभाग को स्पष्ट निर्देश दिया। कोर्ट ने कहा कि अधिग्रहित भूमि से उखाड़े गए सेब और नाशपाती के पेड़ों का बाजार मूल्य के अनुरूप कुल 12,99,205 रुपये का संशोधित मुआवजा याचिकाकर्ता को प्रदान किया जाए।
अदालत ने सरकारी रिकॉर्ड की जांच कर विभाग का दावा नकारा
अदालत ने मुआवजा राशि को संशोधित करते हुए 14 फलदार पेड़ों के लिए 11,24,605 रुपये की राशि तय की है। इसके अतिरिक्त 4 अन्य पेड़ों के लिए 1,74,600 रुपये का अलग से भुगतान किया जाएगा। जुब्बल तहसील के धार गांव की निवासी सत्या देवी ने इस उचित मुआवजे के लिए अदालत का दरवाजा खटखटाया था।
लोक निर्माण विभाग ने पहले अदालत में झूठा दावा किया था कि इस अधिग्रहित भूमि पर कोई फलदार पेड़ मौजूद ही नहीं थे। हालांकि माननीय न्यायाधीश ने स्वयं सरकारी रिकॉर्ड का बारीकी से निरीक्षण किया। जांच में विभाग के ही आधिकारिक दस्तावेजों से जमीन पर पेड़ होने की बात पूरी तरह सच साबित हुई।
वैज्ञानिक फॉर्मूले के आधार पर अतिरिक्त ब्याज देने का फैसला
अदालत ने इस मामले में बागवानी विशेषज्ञ डॉ. एसपी भारद्वाज की विस्तृत रिपोर्ट को सबसे महत्वपूर्ण साक्ष्य माना। डॉ. भारद्वाज ने ‘हरबंस सिंह फॉर्मूला’ का उपयोग कर इन फलदार पेड़ों का सही मूल्यांकन किया था, जिसे माननीय कोर्ट ने पूरी तरह वैज्ञानिक और निष्पक्ष पाया।
इसी आधार पर कोर्ट ने याचिकाकर्ता को धारा 23(2) के तहत 30 फीसदी सोलेशियम और धारा 23(1-ए) के तहत 12 फीसदी वार्षिक अतिरिक्त मुआवजा देने का आदेश दिया। इसके अलावा अदालत ने 11 जनवरी 2012 से पूरी अदायगी होने तक 9 से 15 फीसदी की दर से वार्षिक ब्याज देने का भी फैसला सुनाया।

