Bihar News: पटना हाईकोर्ट ने भागलपुर के चर्चित बिश्वनाथ गुप्ता मर्डर केस में बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने व्यवसायी दीपक कुमार उर्फ दीपक साह को जबरन आरोपी बनाने वाले निचली अदालत के आदेश को पूरी तरह रद कर दिया है। इस फैसले से पीड़ित व्यवसायी को कानूनी तौर पर बहुत बड़ी राहत मिली है।
जस्टिस अंसुल की एकलपीठ ने मामले की गहन सुनवाई के बाद अपना फैसला सुनाया। हाईकोर्ट ने कहा कि याचिकाकर्ता को इस मामले में फंसाने की पूरी कानूनी प्रक्रिया प्रथम दृष्टया दुर्भावना से प्रेरित लगती है। अदालत के मुताबिक पुलिस और जांच एजेंसी के पास व्यवसायी के खिलाफ कोई पुख्ता सबूत नहीं थे।
सीआरपीसी की धारा 319 के तहत समन जारी करने का आधार गलत
हाईकोर्ट ने भागलपुर के एडीजे-7 कोर्ट द्वारा 22 अगस्त 2019 को जारी आदेश को निरस्त कर दिया है। निचली अदालत ने सीआरपीसी की धारा 319 के तहत व्यवसायी को अतिरिक्त आरोपी के रूप में समन जारी किया था। कोर्ट ने कहा कि समन भेजने के लिए जरूरी और मजबूत साक्ष्य गायब थे।
यह पूरा मामला 2 जून 2012 का है जब भागलपुर के फल व्यवसायी बिश्वनाथ कुमार गुप्ता की गोली मारकर हत्या कर दी गई थी। इस मामले में दर्ज शुरुआती एफआईआर में याचिकाकर्ता दीपक साह का नाम कहीं भी शामिल नहीं था। पुलिस ने शुरुआती जांच के बाद व्यवसायी को क्लीन चिट दे दी थी।
शुरुआती पुलिस जांच में कुछ गवाहों के बयानों के आधार पर व्यवसायी का नाम बाद में जोड़ा गया था। हालांकि पुलिस ने गहन छानबीन के बाद कोर्ट में फाइनल रिपोर्ट दाखिल कर दी थी। तब अदालत ने पुलिस की इस अंतिम रिपोर्ट को कानूनन स्वीकार भी कर लिया था।
मृतक की मां का दावा केवल अखबार की खबरों पर आधारित निकला
हाईकोर्ट ने ट्रायल कोर्ट के पूरे रिकॉर्ड का खुद बारीकी से अवलोकन किया। अदालत ने पाया कि मामले के 11 मुख्य गवाहों में से 10 गवाहों ने व्यवसायी के खिलाफ एक भी आरोप नहीं लगाया था। गवाहों के बयानों में दीपक साह के खिलाफ कोई आपराधिक संलिप्तता नहीं मिली।
केवल मृतक की बुजुर्ग मां मंजुला देवी ने आरोप लगाया था कि दीपक साह ने शूटर को 50 हजार रुपये दिए थे। लेकिन कोर्ट में जिरह के दौरान उन्होंने खुद माना कि उन्हें यह जानकारी किसी चश्मदीद से नहीं बल्कि केवल अखबार में छपी एक खबर से मिली थी।
हाईकोर्ट ने टिप्पणी की कि निचली अदालत ने इस महत्वपूर्ण तथ्य को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया। ट्रायल कोर्ट ने केवल मुख्य परीक्षा के बयानों को आधार बनाकर समन जारी कर दिया था। इसके अलावा कोर्ट ने गवाहों के धारा 164 के तहत दर्ज बयानों पर भरोसा किया था।
सुप्रीम कोर्ट के फैसलों के अनुसार धारा 164 का बयान स्वतंत्र साक्ष्य नहीं
माननीय हाईकोर्ट ने स्पष्ट किया कि सुप्रीम कोर्ट के कई फैसले यह साफ करते हैं कि धारा 164 के बयान स्वतंत्र साक्ष्य नहीं माने जा सकते। इनका इस्तेमाल केवल पुष्टि के लिए होता है। किसी को आरोपी बनाने के लिए सिर्फ संदेह या सामान्य आरोप लगाना काफी नहीं है।
अदालत ने अंत में कहा कि व्यवसायी के खिलाफ मुकदमा चलाने का कोई ठोस आधार मौजूद नहीं था। पूरी कानूनी कार्रवाई शुरू से ही दुर्भावना की भावना से प्रभावित दिखाई देती है। इसी वजह से हाईकोर्ट ने याचिका स्वीकार करते हुए निचली अदालत का विवादित समन आदेश खारिज कर दिया।
Reported By: Amit Yadav


