Shimla News: हिमाचल प्रदेश हाई कोर्ट ने जेलों में बंद गरीब और असहाय कैदियों के मानवाधिकारों को लेकर एक बेहद संवेदनशील और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने स्पष्ट किया कि केवल निर्धनता और आर्थिक तंगी के कारण पैरोल की कानूनी शर्तों को पूरा न कर पाना किसी कैदी की रिहाई रोकने का ठोस आधार बिल्कुल नहीं हो सकता।
कंडा जेल में उम्रकैद काट रहे कैदी को मिली बड़ी राहत
हाई कोर्ट के न्यायाधीश संदीप शर्मा की एकलपीठ ने माडल सेंट्रल जेल कंडा में उम्रकैद की सजा काट रहे एक कैदी की याचिका को मंजूर कर लिया। कोर्ट ने कैदी को उत्तर प्रदेश के जिला मजिस्ट्रेट के पास जाने के बजाय सीधे कंडा जेल अधीक्षक के समक्ष ही अपना पर्सनल बांड भरने की विशेष स्वीकृति दे दी।
अदालत ने अपने फैसले में गुजरात और राजस्थान हाई कोर्ट के पुराने ऐतिहासिक निर्णयों का प्रमुखता से हवाला दिया। कोर्ट ने कहा कि पैरोल व्यवस्था का मुख्य उद्देश्य कैदी को समाज और उसके परिवार से जोड़े रखना है। गरीबी कोई अपराध नहीं है और पैरोल की सुविधा केवल अमीर कैदियों के लिए सीमित नहीं हो सकती।
सिर्फ पर्सनल बांड पर रिहा करना प्रशासन का मुख्य कर्तव्य
न्यायाधीश ने टिप्पणी की कि यदि कोई कैदी सचमुच अत्यंत गरीब है, तो प्रशासन का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि उसे केवल पर्सनल बांड पर तुरंत रिहा करे। जमानत बांड का मूल उद्देश्य कैदी की जेल में वापसी सुनिश्चित करना है। यह प्रक्रिया जेल अधीक्षक के पास कागजात जमा करके भी आसानी से पूरी हो सकती है।
हाई कोर्ट ने पैरोल आदेश की कठिन शर्तों में संशोधन करते हुए कैदी को बड़ी राहत दी। अदालत ने उसे एक लाख रुपये का पर्सनल और सिक्योरिटी बांड सीधे कंडा जेल अधीक्षक के पास जमा कराने की अनुमति दे दी। इस फैसले से प्रदेश की विभिन्न जेलों में बंद कई गरीब और लाचार कैदियों को सीधा कानूनी लाभ मिलेगा।

