New Delhi News: देश की सर्वोच्च अदालत ने वकालत के पेशे में फर्जीवाड़े को रोकने के लिए बड़ा कदम उठाया है। सुप्रीम कोर्ट ने देश में वकीलों के लिए एक राष्ट्रीय डिजिटल रजिस्ट्री बनाने की मांग वाली याचिका पर केंद्र सरकार और बार काउंसिल ऑफ इंडिया (BCI) से जवाब मांगा है। अदालत ने इस मामले को बेहद गंभीरता से लिया है।
फर्जी प्रैक्टिशनर्स पर नकेल कसने की तैयारी
इस प्रस्तावित डिजिटल रजिस्ट्री के तहत देश के प्रत्येक मान्यता प्राप्त वकील को एक यूनिक नेशनल एडवोकेट आइडेंटिफायर (विशिष्ट पहचान संख्या) दिया जाएगा। इससे देश के किसी भी कोने में प्रैक्टिस कर रहे फर्जी वकीलों की तुरंत पहचान हो सकेगी। मुख्य न्यायाधीश सूर्यकांत और जस्टिस वी. मोहन की पीठ ने इस विचार को बेहद तकनीकी और नवोन्मेषी बताया है।
बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने उठाई आवाज
यह महत्वपूर्ण याचिका बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया (BAI) द्वारा दायर की गई है। याचिका में अधिवक्ताओं के लिए डिजिटल आचार संहिता बनाने की भी मांग की गई है। बीएआई की ओर से कोर्ट में वरिष्ठ अधिवक्ता विपिन नायर और प्रशांत कुमार ने दलीलें पेश कीं। शीर्ष अदालत ने सभी संबंधित पक्षों को नोटिस जारी कर जुलाई में अगली सुनवाई तय की है।
विश्वविद्यालयों को भी पक्षकार बनाने का निर्देश
सुनवाई के दौरान सुप्रीम कोर्ट की पीठ ने कहा कि इस व्यवस्था को सुचारू रूप से लागू करने के लिए कानून विश्वविद्यालयों को भी शामिल करना जरूरी है। बार एसोसिएशन के वकील ने कोर्ट को बताया कि उन्होंने पहले ही विश्वविद्यालय अनुदान आयोग (UGC) को इस मामले में पक्षकार बना लिया है, जिससे फर्जी डिग्री धारकों पर रोक लगाई जा सके।
देश में हर तीसरा वकील फर्जी होने का दावा
बार एसोसिएशन ऑफ इंडिया ने अपनी याचिका में एक बेहद चौंकाने वाला दावा किया है। एसोसिएशन के मुताबिक, वर्तमान में देश में वकालत करने वाले हर तीन में से एक वकील के पास फर्जी दस्तावेज हैं। इस गंभीर घुसपैठ पर सुप्रीम कोर्ट ने बुधवार को कड़ा संज्ञान लिया। कोर्ट ने पूरे देश के वकीलों का प्रामाणिक डेटाबेस तैयार करने की प्रक्रिया शुरू कर दी है।
Author: Adv Anuradha Rajput


