केरल विधानसभा चुनाव 2026: कांग्रेस की सत्ता में वापसी, लेकिन लेफ्ट के गढ़ में भाजपा की ऐतिहासिक सेंधमारी

Kerala News: केरल विधानसभा चुनाव 2026 के सोमवार को घोषित परिणामों ने राज्य की राजनीतिक परंपरा को दोहराते हुए सत्ता परिवर्तन पर मुहर लगा दी है। कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूनाइटेड डेमोक्रेटिक फ्रंट (UDF) ने शानदार प्रदर्शन करते हुए बहुमत का आंकड़ा पार कर लिया है, जिससे पिनाराई विजयन के नेतृत्व वाली एलडीएफ सरकार की तीसरी बार सत्ता में आने की कोशिशें नाकाम हो गईं। हालांकि, इस चुनाव का सबसे बड़ा ‘एक्स फैक्टर’ भारतीय जनता पार्टी (BJP) का प्रदर्शन रहा है, जिसने वामपंथ के मजबूत किलों को ढहाते हुए तीन विधानसभा सीटों पर ऐतिहासिक जीत दर्ज की है।

भाजपा की तीन सीटों पर जीत ने बदला राजनीतिक विमर्श

केरल की राजनीति में भाजपा की पकड़ पारंपरिक रूप से कमजोर मानी जाती थी, लेकिन इस बार पार्टी ने तीन महत्वपूर्ण सीटों—नेमोम, काझकूटम और चथान्नूर—पर कब्जा कर राजनीतिक विश्लेषकों को चौंका दिया है। तिरुवनंतपुरम जिले की हाई-प्रोफाइल सीट नेमोम से भाजपा प्रदेश अध्यक्ष राजीव चंद्रशेखर ने सीपीएम के दिग्गज नेता वी. शिवनकुट्टी को 4,978 मतों के अंतर से पराजित किया। यह जीत भाजपा के लिए संजीवनी के समान है, क्योंकि पार्टी ने एक दशक बाद इस महत्वपूर्ण सीट को वापस पाने में सफलता हासिल की है।

काझकूटम और चथान्नूर में भी खिला कमल

भाजपा के लिए दूसरी महत्वपूर्ण जीत काझकूटम विधानसभा क्षेत्र से आई, जहाँ पूर्व केंद्रीय मंत्री वी. मुरलीधरन ने सीपीएम के कड़कम्पल्ली सुरेंद्रन को मात्र 428 वोटों के बेहद करीबी अंतर से शिकस्त दी। इसी प्रकार, कोल्लम जिले की चथान्नूर सीट पर भाजपा के बी.बी. गोपाकुमार ने सीपीएम के आर. राजेंद्रन को 4,002 मतों से हराकर इतिहास रच दिया। इन तीनों ही सीटों पर कांग्रेस उम्मीदवार तीसरे स्थान पर रहे, जो यह संकेत देता है कि केरल में भाजपा अब एक गंभीर राजनीतिक विकल्प के रूप में उभर रही है।

यूडीएफ की प्रचंड लहर में सिमटा वामपंथी किला

कांग्रेस के नेतृत्व वाले यूडीएफ ने राज्य की 140 सीटों में से 100 से अधिक पर बढ़त और जीत के साथ स्पष्ट बहुमत हासिल किया है। अकेले कांग्रेस पार्टी ने 63 से अधिक सीटों पर जीत दर्ज की है, जबकि सीपीएम नेतृत्व वाला एलडीएफ मात्र 35-37 सीटों पर सिमटता नजर आ रहा है। मुख्यमंत्री पिनाराई विजयन के मंत्रिमंडल के 13 मंत्रियों को हार का सामना करना पड़ा है, जो राज्य में सरकार के प्रति भारी सत्ता विरोधी लहर (Anti-incumbency) को दर्शाता है। यूडीएफ की इस जीत ने केरल में हर पांच साल में सत्ता बदलने की रवायत को फिर से जीवित कर दिया है।

भविष्य की राजनीति के लिए भाजपा का नया आधार

केरल के इन चुनावी परिणामों ने स्पष्ट कर दिया है कि भाजपा का वोट बैंक अब केवल शहरी इलाकों तक सीमित नहीं रहा, बल्कि ग्रामीण और अर्द्ध-शहरी क्षेत्रों में भी पैठ बना चुका है। वामपंथी वोटों के विभाजन और केंद्र सरकार की विकास योजनाओं के प्रभाव ने भाजपा को वह आधार प्रदान किया है, जिसकी उसे लंबे समय से तलाश थी। हालांकि यूडीएफ सरकार बनाने जा रही है, लेकिन तीन सीटों पर भाजपा की जीत आने वाले समय में केरल के द्विध्रुवीय राजनीतिक ढांचे (UDF-LDF) को त्रिकोणीय संघर्ष में बदलने की क्षमता रखती है।

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