महंगे ईंधन के दौर में क्या वाकई किफायती है भारतीय पब्लिक ट्रांसपोर्ट या छिपे खर्च जेब कर रहे हैं खाली?

India News: वैश्विक संकट के कारण देश में ईंधन की कीमतें लगातार आसमान छू रही हैं। सरकारें नागरिकों से निजी वाहन छोड़कर पब्लिक ट्रांसपोर्ट अपनाने की अपील कर रही हैं। हालांकि, मेट्रो, बस और लोकल ट्रेन का किराया तो कम है, लेकिन खराब कनेक्टिविटी और सफर में लगने वाला अतिरिक्त समय आम जनता की मुश्किलें बढ़ा रहा है।

दैनिक यात्रा के शुद्ध किराए को देखें तो सार्वजनिक परिवहन आज भी सबसे सस्ता साधन है। यदि कोई व्यक्ति प्रतिदिन 10 से 15 किलोमीटर का सफर करता है, तो निजी वाहन के ईंधन खर्च के मुकाबले उसका बेहद छोटा हिस्सा खर्च होता है। कार के इंश्योरेंस, मेंटेनेंस और पार्किंग जैसे खर्च इस अंतर को बहुत ज्यादा बढ़ा देते हैं।

लास्ट माइल कनेक्टिविटी है सबसे बड़ी मुसीबत

भारतीय शहरों में मेट्रो का न्यूनतम किराया 20 से 50 रुपये के बीच है। हालांकि, घर से मेट्रो स्टेशन तक पहुंचने का खर्च इस गणित को पूरी तरह बिगाड़ देता है। फीडर बसों और ई-रिक्शा के अभाव में यात्रियों को ऑटो के लिए अतिरिक्त 20 से 100 रुपये तक खर्च करने पड़ते हैं।

मेट्रो के तेजी से होते विस्तार के बाद भी आज आम जनता के लिए बसें ही सबसे बड़ा सहारा हैं। निम्न और मध्यम वर्ग के लिए बसों का सफर बेहद सस्ता पड़ता है। कई राज्य सरकारें परिवहन निगमों को भारी सब्सिडी दे रही हैं, जिससे सरकारी खजाने पर वित्तीय बोझ लगातार बढ़ता जा रहा है।

दिल्ली सरकार ने बदली महिलाओं की मुफ्त बस योजना

दिल्ली सरकार ने हाल ही में डीटीसी बसों में महिलाओं के लिए चल रही मुफ्त सफर की योजना में बड़ा बदलाव किया है। अब पुरानी ‘पिंक टिकट’ व्यवस्था की जगह ‘सहेली पिंक स्मार्ट कार्ड’ योजना लागू होगी। इसके तहत केवल दिल्ली की स्थाई निवासी महिलाओं और ट्रांसजेंडर व्यक्तियों को ही मुफ्त यात्रा का लाभ मिलेगा।

मध्यम वर्ग के लिए मेट्रो तेज और विश्वसनीय विकल्प है, लेकिन कम दूरी के लिए यह जेब पर भारी पड़ती है। वर्तमान में देश में पेट्रोल की कीमत 95 से 105 रुपये और सीएनजी की कीमत 77 से 83 रुपये के आसपास है। इसके बावजूद लोग भारी भीड़, लंबे इंतजार और सुरक्षा चिंताओं के कारण निजी वाहनों को चुनते हैं।

Author: Rajesh Kumar

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