हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय में पढ़ाई का ‘दिवाला’: 2 करोड़ की मशीनें कबाड़ और 186 नियुक्तियां संदेह के घेरे में

Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश के सबसे प्रतिष्ठित शिक्षण संस्थान, हिमाचल प्रदेश विश्वविद्यालय (HPU) की साख पर कैग (CAG) की ताजा रिपोर्ट ने गंभीर सवाल खड़े कर दिए हैं। 30 मार्च 2026 को विधानसभा में पेश की गई इस रिपोर्ट ने विश्वविद्यालय की खोखली होती शैक्षणिक व्यवस्था और प्रशासनिक लापरवाही की परतें खोल दी हैं। रिपोर्ट के मुताबिक, साल 2020 से 2023 के बीच विश्वविद्यालय में शिक्षकों की भारी कमी रही और करीब 186 नियुक्तियों की पारदर्शिता पर अब उंगलियां उठ रही हैं।

शिक्षकों की भारी कमी और संदिग्ध नियुक्तियां

कैग की रिपोर्ट बताती है कि विश्वविद्यालय में 27 से 37 प्रतिशत तक संकाय पद खाली पड़े हैं। हैरानी की बात यह है कि खाली पदों को भरने के बजाय जो नियुक्तियां की गईं, उनमें नियमों को ताक पर रखा गया। रिपोर्ट में एक अयोग्य सहायक प्राध्यापक और एक अतिथि शिक्षक की नियुक्ति पर यूजीसी के नियमों के उल्लंघन का जिक्र है। इसके अलावा, 186 नियुक्तियों में दस्तावेजों का उचित सत्यापन तक नहीं किया गया, जो सीधे तौर पर भ्रष्टाचार और लापरवाही की ओर इशारा करता है।

करोड़ों का इआरपी सिस्टम फेल, लैब बनीं शोपीस

विश्वविद्यालय के बुनियादी ढांचे का हाल और भी बुरा है। छात्रों की सुविधा के लिए 11.19 करोड़ रुपये की भारी-भरकम राशि से बनाया गया इआरपी (ERP) सिस्टम पूरी तरह निष्क्रिय पाया गया। विज्ञान की प्रयोगशालाओं में 79 प्रतिशत तक उपकरणों की कमी है। वहीं, लगभग 1.99 करोड़ रुपये की लागत से खरीदे गए आधुनिक वैज्ञानिक उपकरण सालों से धूल फांक रहे हैं और खराब पड़े हैं। डिजिटल इंडिया के दौर में यहाँ केवल 51 प्रतिशत कक्षाएं ही आईसीटी (ICT) से लैस मिलीं।

पुराना पाठ्यक्रम और शोध के नाम पर खानापूर्ति

शैक्षणिक गुणवत्ता की हालत यह है कि कई कोर्स सालों से अपडेट नहीं हुए हैं। शोध (Research) के क्षेत्र में विश्वविद्यालय का प्रदर्शन शर्मनाक रहा है। तीन सालों में प्रति शिक्षक औसतन केवल 0.1 शोध प्रोजेक्ट शुरू हुआ। 214 शिक्षकों ने मिलकर केवल 21 प्रोजेक्ट्स पर काम किया, जो नैक (NAAC) के मानकों के बेहद करीब भी नहीं है। उद्योगों के साथ किए गए 24 करारों (MoUs) में से केवल पांच ही धरातल पर सक्रिय हैं, जिससे छात्रों के प्लेसमेंट के अवसर भी खत्म हो रहे हैं।

25 साल बाद भी अधूरी हैं योजनाएं

प्रशासनिक सुस्ती का आलम यह है कि 16 में से 11 यूजीसी चेयर (पीठें) अपनी अधिसूचना के 25 साल बाद भी सक्रिय नहीं हो पाई हैं। कैग ने चेतावनी दी है कि अगर संसाधनों की कमी और इन प्रशासनिक खामियों को तुरंत दुरुस्त नहीं किया गया, तो प्रदेश के युवाओं का भविष्य अंधकार में जा सकता है।

कैग की इस रिपोर्ट ने सरकार और विश्वविद्यालय प्रशासन के उन दावों की पोल खोल दी है, जो उच्च शिक्षा के स्तर को बेहतर बनाने के लिए किए जाते रहे हैं।

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