अक्षरधाम में 108 फीट ऊंची मूर्ति का रहस्य: बिना गिरे एक पैर पर कैसे खड़ी है ये विशालकाय प्रतिमा?

Delhi News: दिल्ली का स्वामीनारायण अक्षरधाम मंदिर इन दिनों एक विशालकाय मूर्ति को लेकर भारी चर्चा में है। मंदिर परिसर में 108 फीट ऊंची भव्य मूर्ति स्थापित की गई है। यह मूर्ति केवल एक पैर पर टिकी है और इसके दोनों हाथ ऊपर की ओर उठे हैं। हवा में एक पैर पर खड़ी इस भारी-भरकम मूर्ति का विज्ञान लोगों को काफी हैरान कर रहा है। हर कोई इस अद्भुत मूर्ति के निर्माण और इसके पीछे छिपे रहस्य को समझना चाहता है।

भगवान स्वामीनारायण के बालयोगी रूप की है प्रतिमा

अक्षरधाम मंदिर की यह मूर्ति भगवान स्वामीनारायण के बालयोगी रूप नीलकंठ वर्णी की है। स्वामीनारायण एक महान संत थे जिन्होंने ग्यारह वर्ष की उम्र में अपना घर छोड़ दिया था। साल 1792 में उन्होंने नंगे पैर बारह हजार किलोमीटर का सफर तय किया। उन्होंने नेपाल के मुक्तिनाथ में भयानक ठंड के बीच कठोर तपस्या की थी। यह अद्भुत मूर्ति उसी तपो मुद्रा को दर्शाती है। इस पवित्र प्रतिमा का ऐतिहासिक महत्व सभी भक्तों के लिए बहुत अधिक माना जाता है।

विज्ञान और इंजीनियरिंग का बेहतरीन नमूना है यह मूर्ति

आम तौर पर ऊंची मूर्तियों का आधार काफी चौड़ा होता है। लेकिन यह प्रतिमा विज्ञान के वर्टिकल कैंटिलीवर सिद्धांत पर आधारित है। मूर्ति का सारा वजन केवल एक पैर के खास एंगल पर टिका है। इसे मुख्य रूप से तांबे वाली पंचधातु से तैयार किया गया है। मूर्ति को सीधा खड़ा रखने के लिए इसके अंदर एक मजबूत धातु का ढांचा मौजूद है। यह धातु का ढांचा जमीन के अंदर कंक्रीट से पूरी मजबूती के साथ सीधे तौर पर जुड़ा हुआ है।

तेज हवाओं में भी नहीं हिलती यह भारी-भरकम प्रतिमा

मजबूत ढांचे और कंक्रीट बेस के कारण यह विशालकाय मूर्ति तेज हवा में भी बिल्कुल नहीं हिलती है। यह खास मूर्ति सौ एकड़ में फैले विशाल मंदिर परिसर की सुंदरता को बढ़ाती है। इस पूरे मंदिर का निर्माण प्राचीन मारू गुर्जर वास्तुकला के आधार पर किया गया है। मंदिर को बनाते समय वास्तुशास्त्र और पंचशास्त्र के सभी नियमों का पूरी तरह पालन किया गया है। इस भव्य मंदिर की मजबूत नींव में करीब पांच मिलियन ईंटों का इस्तेमाल हुआ है।

पजल की तरह आपस में जुड़े हैं मंदिर के भारी पत्थर

इस मंदिर के निर्माण में सैंड स्टोन और मार्बल का बेहद खूबसूरती से उपयोग हुआ है। पत्थरों को इस तरह तराशा गया है कि वे पजल की तरह आपस में आसानी से जुड़ जाते हैं। मंदिर की नींव को मजबूत करने के लिए पत्थरों और रेत की परतें बिछाई गई हैं। इसके ठीक ऊपर डेढ़ मीटर मोटा कंक्रीट और साढ़े छह मीटर तक ईंटें लगाई गई हैं। इसी बेहद सॉलिड नींव के ऊपर बीस भारी मूर्तियां सुरक्षित खड़ी हैं।

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