Legal News: सुप्रीम कोर्ट ने भारत के संविधान के अनुच्छेद 142 के तहत अपनी विशेष शक्तियों का इस्तेमाल करते हुए एक बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। शीर्ष अदालत ने यौन अपराधों से बच्चों का संरक्षण (पॉक्सो) कानून के तहत दोषी ठहराए गए एक व्यक्ति की सजा को पूरी तरह रद कर दिया है।
शीर्ष अदालत ने ‘पूरा न्याय’ करने के लिए किया विशेष शक्ति का उपयोग
सर्वोच्च न्यायालय ने इस मामले की गंभीरता को देखते हुए पाया कि पीड़िता ने बालिग होने के बाद खुद अपनी मर्जी से उसी दोषी व्यक्ति के साथ विवाह कर लिया था। भारतीय संविधान का अनुच्छेद 142 सुप्रीम कोर्ट को यह विशेष अधिकार देता है कि वह अपने पास लंबित किसी भी मामले में पूरा न्याय करने के लिए जरूरी आदेश जारी कर सके।
यह मामला तब शुरू हुआ था जब पीड़िता 12वीं कक्षा में पढ़ रही थी और उसे उस व्यक्ति से प्रेम हो गया था। हालांकि, उस समय युवक ने शादी करने से साफ इन्कार कर दिया था। इसके बाद पीड़िता ने पुलिस में शिकायत दर्ज कराई थी, जिसने आगे चलकर एक गंभीर कानूनी रूप ले लिया।
हाई कोर्ट से झटका लगने के बाद न्याय के लिए पहुंचे सुप्रीम कोर्ट
नाबालिग के साथ शारीरिक संबंध बनाने के गंभीर आरोप में निचली अदालत ने उस शख्स को पॉक्सो एक्ट के तहत 10 साल की कठोर सजा सुनाई थी। इस कानूनी कार्रवाई के बाद महिला ने किसी अन्य व्यक्ति से शादी कर ली थी, लेकिन पिछले रिश्ते की बात सामने आने पर उसके पति ने उसे छोड़ दिया।
इसके बाद जब दोषी व्यक्ति जमानत पर जेल से बाहर आया, तो उसने महिला के साथ दोबारा सुलह कर ली। दोनों ने आपसी सहमति से शादी कर ली और पति-पत्नी के रूप में साथ रहने लगे। इसके बाद महिला ने मद्रास हाई कोर्ट में याचिका दायर कर अपने पति की सजा रद करने की गुहार लगाई थी।
दो सदस्यीय खंडपीठ ने दिया समाज में शांति से जीने का अधिकार
मद्रास हाई कोर्ट ने कानूनी तकनीकी बारीकियों को देखते हुए महिला की उस याचिका को पूरी तरह खारिज कर दिया था। हाई कोर्ट से निराशा हाथ लगने के बाद यह दंपती इंसाफ की आस में सुप्रीम कोर्ट पहुंचा था। सर्वोच्च अदालत ने दोनों पक्षों की दलीलों को बेहद सहानुभूति और ध्यानपूर्वक सुना।
सुप्रीम कोर्ट के माननीय न्यायाधीश जे.के. माहेश्वरी और न्यायाधीश अतुल एस. चंदुरकर की दो सदस्यीय खंडपीठ ने इस संवेदनशील याचिका पर सुनवाई की। खंडपीठ ने अपने फैसले में स्पष्ट रूप से कहा कि अपील करने वाला व्यक्ति और पीड़ित महिला अब समाज में पति-पत्नी के तौर पर शांति से रहने के लिए पूरी तरह स्वतंत्र हैं।
खंडपीठ ने अपने आदेश में आगे कहा कि इस मामले के गुण-दोष पर विस्तार से जाए बिना और केवल इसके विशेष व्यावहारिक तथ्यों को देखते हुए, अदालत को यह उचित लगता है कि वह अपनी व्यापक संवैधानिक शक्तियों का इस्तेमाल करे। इसी के तहत अपीलकर्ता की दोषसिद्धि और सजा के पुराने फैसले को निरस्त किया गया।
Author: Adv Anuradha Rajput

