Meerut News: विदेशी धरती पर ऊंची शिक्षा पाने का सपना देख रहे हजारों भारतीय परिवारों के सामने एक नया संकट खड़ा हो गया है। वैश्विक बाजार में डॉलर और पाउंड के मुकाबले भारतीय रुपये की गिरती कीमत ने अभिभावकों की कमर पूरी तरह तोड़ दी है।
शास्त्री नगर के एक कारोबारी का बेटा अमेरिका से मास्टर्स की डिग्री ले रहा है। पिछले साल तक पिता हर महीने करीब 1.75 लाख रुपये भेजते थे। अब उसी खर्च को पूरा करने के लिए उन्हें हर महीने 1.90 लाख रुपये से ज्यादा भेजने पड़ रहे हैं।
गंगानगर की एक शिक्षिका ने अपनी बेटी को एमएससी करने के लिए यूके भेजा है। परिवार ने एजुकेशन लोन और एफडी के आधार पर पूरा बजट बनाया था। पाउंड की अचानक बढ़ी कीमत ने सारा गणित बिगाड़ दिया। अब दूसरी किस्त भरने के लिए एफडी तोड़नी पड़ी है।
केवल तीन महीनों में बदल गया करेंसी एक्सचेंज का पूरा गणित
विदेशी शिक्षा विशेषज्ञों के अनुसार महज तीन महीने पहले एक अमेरिकी डॉलर के मुकाबले भारतीय रुपया 91 रुपये के स्तर पर था। अब यह करीब 95 रुपये तक पहुंच चुका है। पहली नजर में यह अंतर मामूली लगता है, लेकिन सालाना बजट पर इसका असर लाखों में है।
यदि किसी छात्र का वार्षिक खर्च 50 हजार डॉलर है, तो मार्च में इसके लिए 45 लाख रुपये चाहिए थे। आज वही खर्च बढ़कर साढ़े 47 लाख रुपये हो चुका है। माता-पिता पर सिर्फ करेंसी बदलने के कारण ढाई लाख रुपये का सीधा अतिरिक्त बोझ बढ़ा है।
रुपया कमजोर होने का सीधा असर सिर्फ कॉलेज की ट्यूशन फीस तक ही सीमित नहीं है। विदेशों में पढ़ रहे बच्चों के रूम रेंट, ग्रोसरी, लोकल ट्रांसपोर्ट, मेडिकल इंश्योरेंस और फोन बिल जैसे जरूरी खर्चों का भुगतान भी विदेशी मुद्रा में ही करना पड़ रहा है।
खर्चों को मैनेज करने के लिए अब पार्ट-टाइम जॉब बनी मजबूरी
विदेशों में पढ़ रहे भारतीय छात्रों के बीच अब एक बहुत बड़ा बदलाव साफ दिख रहा है। पहले जहां छात्र अपनी पॉकेट मनी के लिए स्वेच्छा से पार्ट-टाइम जॉब करते थे, वहीं अब यह उनके जिंदा रहने के लिए सबसे बड़ी जरूरत बन चुकी है।
मेरठ के एक छात्र ने हाल ही में ऑस्ट्रेलिया के एक नामी कॉलेज में एमबीए में दाखिला लिया है। परिवार पर वित्तीय बोझ कम करने के लिए वह पढ़ाई के साथ हफ्ते में 20 घंटे कैफे और रिटेल स्टोर में कड़ी मेहनत कर रहा है।
विदेशी मुद्रा दरों में लगातार हो रहे उतार-चढ़ाव के कारण मेरठ के विभिन्न बैंकों में भी एजुकेशन लोन और टॉप-अप फाइनेंस से जुड़ी पूछताछ अचानक बढ़ गई है। बैंक मैनेजर राहुल गर्ग बताते हैं कि अब अभिभावक करेंसी रिस्क को ध्यान में रख रहे हैं।
अभिभावक अब लोन स्वीकृत कराते समय अतिरिक्त क्रेडिट लिमिट और टॉप-अप लोन की शर्तों को बारीकी से समझ रहे हैं। वे यह भी सुनिश्चित कर रहे हैं कि आगे चलकर यदि डॉलर या पाउंड की कीमत और ज्यादा बढ़ी, तो बैंक अतिरिक्त राशि तुरंत मुहैया कराएगा या नहीं।
इस बड़े आर्थिक संकट के कारण अब पैरेंट्स केवल यूनिवर्सिटी की रैंकिंग नहीं देख रहे हैं। काउंसलिंग के दौरान वे सबसे पहले उस देश की करेंसी, वहां रहने की लागत और पढ़ाई पूरी होने के बाद मिलने वाले रोजगार की संभावनाओं का पूरा आकलन कर रहे हैं।
Author: Rajesh Kumar

