संभल हिंसा के आरोपियों को इलाहाबाद हाई कोर्ट से बड़ी राहत, आपराधिक कार्रवाई पर रोक लगा मांगा जवाब

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Sambhal News: उत्तर प्रदेश के संभल में शाही जामा मस्जिद सर्वे के दौरान भड़की भीषण हिंसा के मामले में एक नया मोड़ आया है। इलाहाबाद हाई कोर्ट ने इस प्रकरण के 22 मुख्य आरोपियों को बड़ी अंतरिम राहत प्रदान की है।

उच्च न्यायालय ने इन सभी आरोपियों के खिलाफ निचली अदालत में चल रही आपराधिक कार्रवाई पर फिलहाल पूरी तरह रोक लगा दी है। इसके साथ ही माननीय अदालत ने मामले की गंभीरता को देखते हुए राज्य सरकार और अन्य संबंधित पक्षों से विस्तृत जवाब मांगा है।

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जस्टिस वाणी रंजन अग्रवाल की पीठ ने सुनाया अहम आदेश

इलाहाबाद हाई कोर्ट की माननीय जस्टिस वाणी रंजन अग्रवाल की एकल पीठ ने इन 22 आरोपियों की संयुक्त याचिका पर विस्तार से सुनवाई की। अदालत ने पहली नजर में मामले को विचार योग्य मानते हुए यह बड़ा सुरक्षात्मक आदेश पारित किया है।

हाई कोर्ट ने अब इस पूरे विवादित मामले को चार सप्ताह बाद दोबारा अंतिम सुनवाई के लिए सूचीबद्ध करने का निर्देश दिया है। कोर्ट के इस कड़े रुख से स्थानीय पुलिस प्रशासन और सरकारी जांच एजेंसियों की मुश्किलें आने वाले दिनों में बढ़ सकती हैं।

भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता के तहत दी गई थी कानूनी चुनौती

सभी 22 आरोपियों ने भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता यानी बीएनएसएस की धारा 528 के तहत हाई कोर्ट में याचिका दायर की थी। यह विशेष कानूनी धारा हाई कोर्ट को न्याय के हित में अपनी अंतर्निहित शक्तियों का उपयोग करने का अधिकार देती है।

याचिकाकर्ताओं ने ट्रायल कोर्ट द्वारा उनके खिलाफ लिए गए संज्ञान आदेशों को भी चुनौती दी है। आरोपियों का दावा है कि पुलिस ने बिना किसी पुख्ता और ठोस वैज्ञानिक सबूत के केवल राजनीतिक दबाव में उनके खिलाफ यह गंभीर केस दर्ज किया है।

झूठे वीडियो फुटेज के आधार पर नाम जोड़ने का बड़ा आरोप

सुनवाई के दौरान आरोपियों के वरिष्ठ वकीलों ने दलील दी कि पुलिस की एफआईआर पूरी तरह से मनगढ़ंत तथ्यों पर आधारित है। वकीलों ने दावा किया कि दुर्भावनापूर्ण तरीके से निर्दोष लोगों को इस दंगे में घसीटा गया है ताकि उन्हें प्रताड़ित किया जा सके।

बचाव पक्ष ने कोर्ट को बताया कि पुलिस ने कुछ धुंधले वीडियो फुटेज के आधार पर आरोपियों के नाम जोड़े हैं। हालांकि ऐसा कोई ठोस इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्य मौजूद नहीं है, जिससे हिंसा में उनकी सीधी संलिप्तता या मौके पर मौजूदगी साबित हो सके।

शाही जामा मस्जिद बनाम हरिहर मंदिर का क्या है मुख्य विवाद

संभल का यह पूरा विवाद तब शुरू हुआ था जब एक हिंदू पक्षकार ने स्थानीय अदालत में याचिका दायर की थी। याचिका में दावा किया गया था कि वर्तमान शाही जामा मस्जिद वाले स्थान पर सदियों पहले एक ऐतिहासिक हरिहर मंदिर मौजूद था।

स्थानीय दीवानी अदालत ने इस दावे की सच्चाई जानने के लिए मस्जिद परिसर के वैज्ञानिक सर्वे का आदेश जारी किया था। इसके बाद एडवोकेट कमिश्नर ने वहां सर्वेक्षण की प्रक्रिया शुरू की, जिससे पूरे इलाके में अचानक सामाजिक और राजनीतिक तनाव फैल गया।

सर्वे के दूसरे चरण में भड़की थी हिंसा, चार की हुई थी मौत

नवंबर 2024 में जब सर्वे का दूसरा चरण आयोजित किया जा रहा था, तब भारी भीड़ विरोध प्रदर्शन के लिए एकत्र हो गई थी। देखते ही देखते स्थिति बेकाबू हो गई और प्रदर्शनकारियों व सुरक्षा बलों के बीच हिंसक झड़प शुरू हो गई।

इस भीषण पथराव, आगजनी और गोलीबारी की घटना में चार स्थानीय नागरिकों की दर्दनाक मौत हो गई थी। इसके अलावा दर्जनों पुलिसकर्मी और आम लोग गंभीर रूप से घायल हुए थे, जिसके बाद पुलिस ने शहर में कुल 12 एफआईआर दर्ज की थीं।

हाई कोर्ट के स्टे ऑर्डर का कानूनी रूप से क्या है मतलब

कानूनी विशेषज्ञों के अनुसार हाई कोर्ट ने फिलहाल केवल पुलिस कार्रवाई और ट्रायल कोर्ट के संज्ञान पर अंतरिम रोक लगाई है। इसका सीधा मतलब यह है कि अंतिम फैसला आने तक आरोपियों के खिलाफ कोई दंडात्मक कार्रवाई या जेल भेजने की प्रक्रिया नहीं होगी।

अब चार सप्ताह बाद होने वाली अगली सुनवाई में राज्य सरकार को आरोपियों के खिलाफ जुटाए गए डिजिटल और भौतिक सबूत कोर्ट के सामने पेश करने होंगे। इसके बाद ही तय होगा कि इन आरोपियों के खिलाफ मुकदमा आगे चलेगा या इसे खारिज किया जाएगा।

Author: Ajay Mishra

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