Portal पर ‘कागजी’ खेल: तपती गर्मी में श्रमिकों को पहना दिया स्वेटर, मनरेगा घोटाले का ऐसे हुआ भंडाफोड़

Uttar Pradesh News: उत्तर प्रदेश के ग्रामीण विकास महकमे से भ्रष्टाचार का एक बेहद अनोखा और हैरान करने वाला मामला सामने आया है। यहां मनरेगा माफियाओं ने सरकारी धन हड़पने के लिए एक बड़ा फर्जीवाड़ा किया है। शातिर जालसाजों ने चिलचिलाती और तन झुलसाने वाली जून की भीषण गर्मी में भी पोर्टल पर श्रमिकों को स्वेटर और शाल पहनाकर उनकी उपस्थिति दर्ज करा दी।

दुस्साहस की हद तो यह है कि यह पूरा निर्माण कार्य सिर्फ सरकारी पोर्टल पर ही दर्शाया गया, जबकि जमीनी हकीकत में मौके पर एक मुठ्ठी मिट्टी तक नहीं डाली गई थी। शनिवार को स्थानीय ग्रामीणों की सजगता और शिकायत के बाद इस पूरे फर्जीवाड़े का भंडाफोड़ हुआ है। मामले की जानकारी मिलते ही संबंधित प्रशासनिक अधिकारी अब जांच कराने का दावा कर रहे हैं।

मनरेगा (नया नाम वीबी-जीरामजी) के अंतर्गत यह पूरा घोटाला अभयपुर गांव में अंजाम दिया गया। सरकारी दस्तावेजों के अनुसार, यहां तौलेराम के खेत से लेकर महेश के खेत तक मिट्टी का एक रास्ता बनाया जाना प्रस्तावित था। इस कार्य को कागजों पर अमलीजामा पहनाने के लिए मस्टररोल संख्या 406, 407, 408, 409 और 410 जारी किए गए थे।

इन पांचों मस्टररोल में माफियाओं ने प्रतिदिन चालाकी से 44 श्रमिकों की फर्जी उपस्थिति दर्शा दी। वर्तमान में मनरेगा के तहत प्रत्येक श्रमिक की प्रतिदिन की मजदूरी 252 रुपये निर्धारित है। इस स्वीकृत दर के हिसाब से प्रतिदिन कुल 11,088 रुपये का सरकारी भुगतान होना तय था, जिसे हड़पने की पूरी तैयारी कर ली गई थी।

पुराने फोटो की री-फोटोग्राफी कर पोर्टल पर लगाई सेंध

सरकारी नियमानुसार, मनरेगा कार्यों की पारदर्शिता के लिए प्रत्येक दिन की लाइव फोटो ‘राष्ट्रीय मोबाइल मानिटरिंग सेवा’ (NMMS) पोर्टल पर दर्ज करनी होती है। इसके लिए शातिर आरोपियों ने चार जून की शाम 5.44 बजे स्वेटर पहने श्रमिकों की फोटो अपलोड कर दीं। यही नहीं, कुछ महिलाएं जून के महीने में भारी शाल ओढ़े हुए दिखाई दे रही थीं।

जालसाजों ने इसी तरह पांच और छह जून को भी सर्दियों वाले कपड़े पहने लोगों के फोटो अपलोड कर उन्हें श्रमिक दर्शाया। यह संदिग्ध फोटो किसी तरह ग्रामीणों के हाथ लग गए, जिससे इस पूरे फर्जीवाड़े की पोल खुल गई। ग्रामीणों ने बताया कि फर्जी हाजिरी के लिए मनरेगा से जुड़े लोग अक्सर पुराने फोटो मोबाइल में सुरक्षित रख लेते हैं।

इसके बाद नया काम दर्शाने के लिए वे चालाकी से उस मोबाइल की स्क्रीन पर चल रहे पुराने फोटो को दूसरे फोन से खींचकर पोर्टल पर लाइव अपलोड कर देते हैं। लाइव लोकेशन दिखाने के लिए वे उसी स्थल पर खड़े होकर यह खेल रचते हैं, जहां निर्माण कार्य दर्शाया जाना होता है। हालांकि, अभयपुर में तय जगह पर रत्ती भर भी काम नहीं हुआ था।

पासबुक अपने पास रखकर हड़प लेते हैं सरकारी रकम

मनरेगा के नियमों के मुताबिक, कार्य कराने के लिए सबसे पहले रोजगार सेवक एक प्रस्ताव तैयार करते हैं। इसके बाद ग्राम प्रधान और सचिव उसकी संस्तुति कर काम शुरू कराते हैं। कार्य पूरा होने के बाद अतिरिक्त कार्यक्रम अधिकारी और खंड विकास अधिकारी (BDO) भौतिक सर्वे कर भुगतान की संस्तुति करते हैं, जो 15 दिन बाद सीधे श्रमिकों के खाते में पहुंचता है।

ग्रामीणों ने इस रैकेट पर बेहद गंभीर आरोप लगाए हैं। उनका कहना है कि मनरेगा घोटाला करने वाला यह संगठित गिरोह फर्जी श्रमिकों के बैंक खातों की पासबुक और एटीएम अपने पास ही रख लेता है। खातों में सरकारी रकम ट्रांसफर होने पर ये खाताधारकों को कुछ मामूली हिस्सा देकर शेष पूरी बड़ी रकम खुद आपस में हड़प लेते हैं।

Author: Ajay Mishra

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