Mumbai News: महाराष्ट्र की सियासत में एक बार फिर बहुत बड़ा भूचाल आ गया है। लोकसभा में शिवसेना यूबीटी के नौ में से छह बागी सांसदों ने पार्टी की अहम बैठक से दूरी बना ली। इस कदम से उद्धव ठाकरे गुट में एक और बड़ी टूट की तस्वीर अब पूरी तरह साफ हो गई है।
बागी सांसदों ने संसदीय दल की बैठक में शामिल न होकर उद्धव ठाकरे से अलग रास्ता चुन लिया है। सूत्रों के मुताबिक, इन बागियों ने मुख्यमंत्री एकनाथ शिंदे के नेतृत्व वाली शिवसेना में शामिल होने की पूरी पटकथा लिख दी है। अब केवल कानूनी प्रक्रिया पूरी होने की औपचारिकता बची है।
उद्धव गुट ने चला अयोग्यता का दांव
इस बड़े सियासी संकट के बीच उद्धव ठाकरे की शिवसेना यूबीटी ने बागियों को घेरने की कानूनी तैयारी शुरू कर दी है। पार्टी ने व्हिप जारी होने के बाद भी बैठक में न आने वाले सभी छह सांसदों को कारण बताओ नोटिस थमा दिया है। उनसे सात दिनों में जवाब मांगा गया है।
दूसरी तरफ, बागी खेमा पूरी तरह आश्वस्त नजर आ रहा है। उनका दावा है कि संसदीय दल के कुल नौ में से छह सांसद उनके साथ हैं। यह संख्या कुल क्षमता का दो-तिहाई है। ऐसे में उन पर दल-बदल विरोधी कानून के तहत कोई कार्रवाई नहीं की जा सकती।
संजय राउत का बागियों पर तीखा हमला
बैठक से गायब रहे सांसदों पर शिवसेना यूबीटी के वरिष्ठ नेता संजय राउत का गुस्सा फूट पड़ा। उन्होंने बागियों को ‘गद्दार और धोखेबाज’ कहते हुए तीखी चेतावनी दी। राउत ने कहा कि गद्दार अपने चुनाव क्षेत्रों में नहीं जा पाएंगे और उन्हें जनता सबक सिखाएगी।
संसद के आगामी मानसून सत्र से ठीक पहले क्षेत्रीय दलों में टूट का यह दूसरा बड़ा मामला है। इससे पहले तृणमूल कांग्रेस में भी ऐसी ही हलचल देखी गई थी। गुरुवार को हुई इस अहम बैठक में उद्धव गुट के केवल तीन लोकसभा सांसद और राज्यसभा सांसद संजय राउत ही मौजूद रहे।
लोकसभा स्पीकर के पास पहुंचा मामला
बागी सांसद नागेश आष्टिकर, संजय देशमुख, संजय जाधव, संजय दीना पाटिल, ओमप्रकाश राजेनिंबालकर और भाऊसाहेब वाकचौरे ने बुधवार को ही लोकसभा अध्यक्ष को अलग गुट बनाने का पत्र सौंप दिया था। फिलहाल स्पीकर कार्यालय में इन सांसदों के हस्ताक्षरों का सत्यापन किया जा रहा है।
इधर, मुख्य सचेतक अनिल देसाई ने कहा कि अगर बागी सांसदों ने समय पर नोटिस का जवाब नहीं दिया, तो उनकी संसद सदस्यता रद्द करने की मांग की जाएगी। वहीं, बागी खेमे का कहना है कि पार्टी का व्हिप केवल सदन की कार्यवाही पर लागू होता है, आंतरिक बैठकों पर नहीं।
Author: Sachin Kulkarni

