Delhi News: विश्वविद्यालय अनुदान आयोग यानी यूजीसी ने पीएचडी करने वाले देश भर के रिसर्च स्कॉलर्स के लिए बेहद कड़े निर्देश जारी किए हैं। शोध प्रबंध यानी थीसिस की मौलिकता बनाए रखने के लिए अब आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस और साहित्यिक चोरी पर पूरी तरह लगाम लगा दी गई है।
नए नियमों के अनुसार, अगर किसी छात्र की थीसिस में 10 प्रतिशत से 40 प्रतिशत तक एआई कंटेंट या प्लेजरिज्म पाया जाता है, तो उसे तुरंत वापस कर दिया जाएगा। ऐसी स्थिति में रिसर्चर को छह महीने के भीतर अपनी गलती सुधारकर दोबारा जमा करनी होगी।
यदि थीसिस में 40 से 60 प्रतिशत तक नकल या एआई का उपयोग पकड़ा जाता है, तो छात्र पर बड़ी कार्रवाई होगी। ऐसे स्कॉलर्स को एक साल तक अपनी थीसिस जमा करने से पूरी तरह प्रतिबंधित कर दिया जाएगा, जिससे उनका कीमती समय बर्बाद होगा।
सबसे सख्त नियम 60 प्रतिशत से अधिक की गड़बड़ी पर लागू होगा। यदि किसी शोधार्थी की थीसिस में 60 प्रतिशत से ज्यादा एआई टूल्स का इस्तेमाल या साहित्यिक चोरी मिलती है, तो विश्वविद्यालय प्रशासन उसका पीएचडी रजिस्ट्रेशन तत्काल प्रभाव से हमेशा के लिए कैंसिल कर देगा।
लखनऊ यूनिवर्सिटी और एकेटीयू में लागू हुए बेहद सख्त नियम
लखनऊ विश्वविद्यालय की रैंकिंग सेल की निदेशक प्रोफेसर गीतांजलि मिश्रा ने बताया कि शोध का मुख्य आधार हमेशा मौलिक सोच होना चाहिए। एआई केवल इंटरनेट पर पहले से मौजूद जानकारी को ही सामने रखता है। लखनऊ यूनिवर्सिटी में केवल 10 प्रतिशत प्लेजरिज्म ही स्वीकार्य है।
वहीं डॉ. एपीजे अब्दुल कलाम टेक्निकल यूनिवर्सिटी के डीन एकेडमिक्स प्रोफेसर अनुज कुमार शर्मा ने भी इस पर अपनी बात रखी। उन्होंने साफ कहा कि एआई को केवल एक सहायक टूल के रूप में इस्तेमाल करें, न कि पूरी की पूरी थीसिस लिखने के लिए।
लापरवाही बरतने पर गाइड और सुपरवाइजर पर भी गिरेगी गाज
यूजीसी के हालिया नियमों के मुताबिक, अगर किसी छात्र की थीसिस में भारी गड़बड़ी या नकल पकड़ी जाती है, तो केवल छात्र ही नहीं बल्कि उसके गाइड पर भी कड़ी कार्रवाई होगी। इसके लिए संबंधित फैकल्टी या सुपरवाइजर के खिलाफ विभागीय जांच की जाएगी।
नियमों के उल्लंघन पर गाइड के प्रमोशन को रोकने और उनके डिमोशन यानी पदावनति तक का सख्त प्रावधान किया गया है। इस कड़े कदम से अब प्रोफेसर भी छात्रों द्वारा जमा किए जाने वाले कंटेंट की गहनता से खुद बारीकी से जांच करने लगे हैं।
जानिए इस बड़े फैसले पर क्या है रिसर्च स्कॉलर्स की राय
एनबीआरआई की पीएचडी स्कॉलर सलोनी शुक्ला का मानना है कि रिसर्च की विश्वसनीयता बनाए रखने के लिए यह फैसला बहुत जरूरी था। हालांकि, उन्होंने सुझाव दिया कि विश्वविद्यालयों को केवल दंडात्मक कार्रवाई करने के बजाय छात्रों को अकादमिक लेखन का उचित प्रशिक्षण भी देना चाहिए।
वहीं शोधार्थी राजपाल सिंह और नवनीत कुमार ने बताया कि पिछले कुछ वर्षों में कॉपी-पेस्ट की प्रवृत्ति काफी तेजी से बढ़ रही थी। एआई के बिना सोचे-समझे इस्तेमाल से रिसर्च की क्वालिटी खराब हो रही थी। इसलिए मौलिक काम को बढ़ावा देने के लिए यह बहुत ही सराहनीय कदम है।
विशेषज्ञों के अनुसार, व्याकरण की अशुद्धियों को ठीक करने और थॉट शेपिंग के लिए एआई की मदद ली जा सकती है। लेकिन क्रिटिकल थिंकिंग वाले मुख्य कामों के लिए पूरी तरह एआई पर निर्भर हो जाना छात्रों की सोचने और समझने की क्षमता को बुरी तरह प्रभावित कर सकता है।
Author: Rashmi Sharma


