Himachal News: हिमाचल प्रदेश के कांगड़ा जिले का एक गांव आज गहरे सदमे में है। 13 साल तक कोमा में जिंदगी और मौत से जंग लड़ने वाले हरीश राणा का मंगलवार को एम्स में निधन हो गया। सुप्रीम कोर्ट के एक आदेश के बाद इस युवक को असहनीय पीड़ा से हमेशा के लिए मुक्ति मिल गई। बेटे के इलाज के लिए पिता ने अपना घर तक बेच दिया था। यह कहानी सिर्फ एक परिवार के टूटने की नहीं है। यह एक पिता के उस भयानक दर्द की कहानी है जिसने अपने बच्चे के लिए अपना सब कुछ न्यौछावर कर दिया।
दिल्ली का रुख और परिवार पर टूटा कहर
साल 1989 में अशोक राणा ने अपने परिवार के बेहतर भविष्य के लिए दिल्ली का रुख किया था। उनका सपना बच्चों को अच्छी शिक्षा और परवरिश देना था। सब कुछ बहुत अच्छे से चल रहा था। हरीश तीन भाई-बहनों में सबसे बड़ा था। उसकी एक छोटी बहन की शादी हो चुकी है। घर में एक छोटा भाई भी है। लेकिन एक अनहोनी ने इस हंसते-खेलते परिवार की सारी खुशियां छीन लीं। एक हादसे ने उनके जवान बेटे को कोमा में धकेल दिया। परिवार का हर सदस्य इस दुखद घटना से पूरी तरह टूट गया।
इलाज के लिए पिता ने बेच दी अपनी सारी संपत्ति
जवान बेटे को बिस्तर पर तड़पते देखना किसी भी पिता के लिए आसान नहीं होता है। अशोक राणा ने बेटे के इलाज में कोई भी कसर बाकी नहीं छोड़ी। उन्होंने अस्पताल और महंगी दवाओं का खर्च उठाने के लिए अपना मकान तक बेच दिया। उन्होंने बेटे को बचाने के लिए दिन-रात कड़ा संघर्ष किया। परिवार ने पूरे 13 साल तक एक नवजात बच्चे की तरह हरीश की देखभाल की। लेकिन इन तमाम कोशिशों के बावजूद उनके जिगर के टुकड़े को बचाया नहीं जा सका। अंततः 13 साल बाद सुप्रीम कोर्ट से हरीश को इच्छा मृत्यु की अनुमति मिली।
पैतृक गांव पलेटा में पसरा मातम और सन्नाटा
कांगड़ा जिले के जयसिंहपुर स्थित सरी पंचायत के पलेटा गांव में आज मातम पसरा है। गांव का हर शख्स इस खबर को सुनकर बेहद गमगीन है। पलेटा निवासी और प्रदेश कांग्रेस कमेटी के पूर्व सदस्य खुशी राम भूरिया ने अपना दुख साझा किया। उन्होंने बताया कि कोरोना महामारी के दौरान भी यह परिवार हरीश को लेकर गांव आया था। तब भी वह बच्चा बस बिस्तर पर ही पड़ा रहता था। आज गांव वालों को इस बात का गहरा दुख है कि इतनी लंबी जद्दोजहद के बाद भी हरीश हमारे बीच नहीं रहा।


