Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश के सरकारी अस्पतालों और मेडिकल कॉलेजों में वर्षों पुराना विशेषाधिकार अब खत्म होने जा रहा है। राज्य सरकार ने स्वास्थ्य संस्थानों में दवा दुकानों के आवंटन को लेकर एक नई और पारदर्शी नीति लागू करने का बड़ा फैसला किया है। इस संबंध में स्वास्थ्य विभाग ने आधिकारिक अधिसूचना भी जारी कर दी है।
अब खुली बोली और टेंडर से होगा दुकानों का आवंटन
नए नियमों के तहत सरकार ने हिमाचल प्रदेश राज्य नागरिक आपूर्ति निगम लिमिटेड को मिलने वाली विशेष रियायतें पूरी तरह समाप्त कर दी हैं। अब इन सभी दवा दुकानों का आवंटन खुली प्रतिस्पर्धा और टेंडर प्रक्रिया के जरिए किया जाएगा। सरकार का तर्क है कि पुरानी व्यवस्था से राज्य को अपेक्षित आर्थिक लाभ नहीं मिल पा रहा था।
अब इन परिसरों में खुली बोली लगाकर बाजार दर के हिसाब से राजस्व कमाया जाएगा। वर्तमान में चल रही निगम की दुकानों से होने वाले शुद्ध लाभ को अब सरकार और नागरिक आपूर्ति निगम के बीच 50:50 के अनुपात में बराबर बांटा जाएगा। इससे सरकारी खजाने को काफी मजबूती मिलने की उम्मीद जताई जा रही है।
राजनीतिक हस्तक्षेप और ट्रांसफर के खेल पर लगेगी लगाम
अस्पताल परिसरों में चलने वाले यह मेडिकल स्टोर हमेशा से राजनीतिक और प्रशासनिक प्रभाव का मुख्य केंद्र रहे हैं। स्वास्थ्य विभाग के सूत्रों के मुताबिक, राज्य में सत्ता बदलते ही इन दुकानों से जुड़े फार्मासिस्टों के तबादलों और फेरबदल का खेल शुरू हो जाता था। दवाओं का बड़ा कारोबार होने के कारण इनमें विशेष रुचि ली जाती थी।
सरकार ने इस राजनीतिक हस्तक्षेप को रोकने के लिए ही खुली बोली लगाने का फैसला किया है। इसके अलावा, प्रत्येक सरकारी मेडिकल कॉलेज में अंतरराष्ट्रीय मानकों वाली उच्च गुणवत्ता की दवाओं की उपलब्धता सुनिश्चित करने के लिए विशेष प्रबंध किए जा रहे हैं। इसके लिए परिसरों के भीतर अत्याधुनिक सुविधाओं वाले विशेष स्टोर स्थापित किए जाएंगे।
मुनाफे की इस नई दौड़ से मरीजों पर बढ़ेगा बोझ?
प्रशासन का दावा है कि इस खुली प्रतियोगिता से पूरी व्यवस्था में पारदर्शिता आएगी और भ्रष्टाचार कम होगा। हालांकि, स्वास्थ्य मामलों के विशेषज्ञों ने इस फैसले पर कुछ चिंताएं भी जताई हैं। उनका कहना है कि इन दुकानों का मुख्य उद्देश्य मरीजों को सस्ती और रियायती दवाएं देना है, न कि केवल भारी मुनाफा कमाना।
हिमाचल के अस्पतालों में हर दिन हजारों गरीब मरीज इलाज के लिए आते हैं। वे पूरी तरह इन्हीं दवा दुकानों पर निर्भर रहते हैं। अब सबसे बड़ा सवाल यही है कि खुली बोली लागू होने के बाद क्या मरीजों को पहले जैसी सस्ती दवाएं मिलती रहेंगी या निजी ठेकेदारों का मुनाफा उनकी जेब पर भारी पड़ेगा।
Reported By: Sunita Gupta


