West Bengal News: पश्चिम बंगाल की राजनीति में इस समय एक बहुत बड़ा सियासी भूचाल आया हुआ है। इस साल सत्ता गंवाने के बाद तृणमूल कांग्रेस यानी टीएमसी गहरे संकट में फंस गई है। पार्टी के कई बड़े नेता, विधायक और सांसद लगातार बगावत कर रहे हैं। विधानसभा में विरोधी गुट ने अपना नया नेता चुन लिया है।
राजनीतिक गलियारों में दावा किया जा रहा है कि टीएमसी के 28 लोकसभा सांसदों में से 20 सांसद पूरी तरह बागी हो चुके हैं। कुछ राज्यसभा सांसदों ने संसद सदस्यता और पार्टी से अपने इस्तीफे सौंप दिए हैं। इस भयंकर संकट के बीच मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने दिल्ली में सोनिया गांधी से खास मुलाकात की है।
दिल्ली में मुलाकातों के दौर से गरमाई राजनीति
ममता बनर्जी के भतीजे और टीएमसी महासचिव अभिषेक बनर्जी ने भी लोकसभा में विपक्ष के नेता राहुल गांधी से लंबी बातचीत की है। इन महत्वपूर्ण मुलाकातों के बाद भारतीय मीडिया में टीएमसी और कांग्रेस के विलय की खबरें तैरने लगी हैं। हालांकि दोनों ही प्रमुख पार्टियों ने इस तरह के दावों को सिरे से खारिज किया है।
कांग्रेस नेता जयराम रमेश ने सोशल मीडिया प्लेटफॉर्म एक्स पर लिखा कि सोनिया गांधी और ममता बनर्जी की मुलाकात को लेकर किए जा रहे दावे बिल्कुल गलत हैं। यह एक सामान्य और सौहार्दपूर्ण बैठक थी। दोनों नेताओं के बीच दशकों पुराने पारिवारिक संबंध हैं, इसलिए कई निजी मुद्दों पर भी चर्चा हुई है।
टीएमसी सांसद कीर्ति आजाद ने कहा कि वे इस संभावित विलय पर कोई टिप्पणी नहीं कर सकते। इस विषय पर केवल पार्टी का शीर्ष नेतृत्व ही आधिकारिक बयान दे सकता है। बंगाल कांग्रेस के वरिष्ठ नेता अधीर रंजन चौधरी ने कहा कि उन्हें ऐसे किसी बड़े प्रस्ताव या चर्चा की कोई जानकारी नहीं है।
अधीर रंजन चौधरी ने समाचार एजेंसी एएनआई से बात करते हुए तंज कसा कि टीएमसी इस समय पूरी तरह बिखरी हुई दिख रही है। इतने सालों तक उन्हें कांग्रेस नेताओं की याद नहीं आई। लेकिन अब चौतरफा संकट में घिरने के बाद वे दिल्ली आकर हमारे बड़े नेताओं के चक्कर काट रहे हैं।
राजनैतिक विश्लेषकों ने जताई विलय पर गहरी चिंता
वरिष्ठ पत्रकारों का मानना है कि यदि कांग्रेस और टीएमसी का विलय होता है, तो इससे ममता बनर्जी को राष्ट्रीय राजनीति में एक बड़ा मंच मिल सकता है। लेकिन यह कदम बंगाल में जमीन खो चुकी कांग्रेस के प्रदेश नेताओं और वामपंथी दलों को बिल्कुल भी पसंद नहीं आएगा।
वरिष्ठ लेखक वीर सांघवी इस संभावित विलय को एक बेहद खराब विचार मानते हैं। उनका कहना है कि ममता बनर्जी आज के समय में अपनी सबसे खराब लोकप्रियता से गुजर रही हैं। ऐसे में कांग्रेस को टीएमसी के इस भारी राजनीतिक संकट और अलोकप्रियता का बोझ अपने सिर पर नहीं उठाना चाहिए।
इतिहास गवाह है कि ममता बनर्जी ने साल 1998 में कांग्रेस से अलग होकर अपनी नई पार्टी बनाई थी। उसके बाद बंगाल में कांग्रेस लगातार कमजोर होती चली गई। साल 2021 के चुनाव आते-आते राज्य विधानसभा से कांग्रेस और वामपंथी दलों का पूरी तरह सूपड़ा साफ हो गया था।
Author: Harikarishan Sharma


