चावल, इंटरनेट और अपनों से मिलने की जंग: क्या ईरान-इराक सीमा पर थम गई है जिंदगी की रफ्तार?

Iran News: अमेरिका, इजरायल और ईरान के बीच छिड़े भीषण युद्ध ने आम इंसान की कमर तोड़ दी है। इराक से लगने वाली ईरानी सीमा पर अब सन्नाटा पसरा रहता है। आवाजाही भले ही कम हो गई हो, लेकिन मजबूरी आज भी लोगों को सरहद पार ले जा रही है। दर्जनों ईरानी नागरिक हर रोज अपनी जान जोखिम में डालकर इराक की सीमा में दाखिल हो रहे हैं। उनका मकसद कोई जंग लड़ना नहीं, बल्कि सस्ता राशन खरीदना, इंटरनेट का इस्तेमाल करना और चंद पलों के लिए अपने परिवार से मिलना है।

सस्ता राशन और सुकून की तलाश

अहवाज की रहने वाली 30 वर्षीय आतेफ अल-फतलावी अपने पति और छोटे बच्चे के साथ बसरा की शलमचा क्रॉसिंग पर मिलीं। वे ईरान में बढ़ती महंगाई से परेशान होकर इराक में किराने का सामान खरीदने आई थीं। आतेफ कहती हैं कि अब स्थिरता की जगह असुरक्षा ने ले ली है। ईरान के मुकाबले इराक में चावल और अन्य बुनियादी चीजें सस्ती मिल रही हैं। उनका अमेरिका के लिए सिर्फ एक ही संदेश है— “यह युद्ध बंद करो।” युद्ध ने आम आदमी की रोजमर्रा की जिंदगी को पूरी तरह तहस-नहस कर दिया है।

इंटरनेट के लिए सरहद पार का सफर

युद्ध के इस दौर में संचार के साधन भी ईरान में ठप पड़ रहे हैं। 39 वर्षीय फातिमा गफ्फारी अपनी आपबीती सुनाते हुए कहती हैं कि उन्हें इंटरनेट चलाने के लिए सीमा पार करके इराक आना पड़ा। अबादान की रहने वाली फातिमा को अपने जरूरी काम निपटाने के लिए इस खतरे का सामना करना पड़ रहा है। उनके जैसे कई लोग हैं जो सिर्फ दुनिया से जुड़ने और अपनों की खैरियत जानने के लिए कुछ घंटों के लिए इराक आते हैं और फिर अपने घरों को लौट जाते हैं।

हवाई हमलों का खौफ और बेबसी

सीमा पर आए 71 वर्षीय रज्जाक सागिर अल-मोसावी की आंखों में भविष्य को लेकर गहरा डर दिखाई देता है। वे कहते हैं कि अब कहीं भी सुरक्षा या भरोसे की गुंजाइश नहीं बची है। किसी को नहीं पता कि कब किसके घर को मिसाइल या लड़ाकू विमान निशाना बना लेंगे। अमेरिका और इजरायल के हवाई हमलों ने ईरान के शहरों में दहशत भर दी है। इसके बावजूद, सीमा पार करने वाले ज्यादातर लोगों का कहना है कि वे खौफ में जरूर हैं, लेकिन अपना वतन छोड़कर कहीं नहीं जाएंगे।

अबादान और अहवाज में बढ़ता संकट

अबादान और अहवाज जैसे शहरों में रहने वाले नागरिकों के लिए अब हर दिन एक नई चुनौती है। बुनियादी जरूरतों के लिए दूसरे देश पर निर्भर होना उनकी मजबूरी बन गई है। युद्ध लंबा खिंचने के कारण सप्लाई चेन पूरी तरह टूट चुकी है। लोग अपनी जड़ों से जुड़े रहना चाहते हैं, लेकिन भूख और संसाधनों की कमी उन्हें सरहद की कटीली तारों के बीच रास्ता खोजने पर मजबूर कर रही है। यह महज एक सैन्य संघर्ष नहीं, बल्कि मानवीय संवेदनाओं के बिखरने की दास्तां है।

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