West Bengal News: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार झेलने के बाद ऑल इंडिया तृणमूल कांग्रेस भयंकर अंदरुनी कलह से जूझ रही है। पार्टी में जारी व्यापक बगावत और इस्तीफों के लंबे सिलसिले ने ममता बनर्जी के राजनीतिक करियर के सामने अब तक की सबसे बड़ी चुनौती खड़ी कर दी है।
राजनीतिक गलियारों में लगातार यह गंभीर सवाल उठ रहा है कि क्या केवल राजकीय सत्ता ही तृणमूल कांग्रेस को एकजुट रखने का एकमात्र जरिया थी। सत्ता हाथ से निकलते ही सार्वजनिक मंचों पर ममता बनर्जी के नेतृत्व और पार्टी की कार्यशैली पर उंगलियां उठने लगी हैं।
पार्टी के पूरी तरह बिखरने और दो-फाड़ होने की अटकलें अब बहुत तेज हो चुकी हैं। विशेषज्ञ पूछ रहे हैं कि क्या बंगाल में भी वर्ष 2022 का महाराष्ट्र मॉडल दोहराया जाएगा और शिवसेना की तरह ही तृणमूल कांग्रेस भी दो अलग गुटों में टूट जाएगी।
फर्जी हस्ताक्षर घोटाले ने बढ़ाई मुख्यमंत्री ममता की मुश्किलें
पार्टी में चुनाव नतीजों के बाद बगावती सुर बहुत ज्यादा आक्रामक हो गए हैं। कई शीर्ष नेताओं ने इस चुनावी हार के लिए सीधे तौर पर सरकार के कामकाज और गलत चुनावी रणनीति को जिम्मेदार ठहराया है। इसके साथ ही कई प्रमुख प्रवक्ताओं के इस्तीफों का दौर शुरू हो गया है।
इस संकट के बीच कथित ‘फर्जी हस्ताक्षर घोटाला’ और वरिष्ठ नेताओं की गहरी नाराजगी ममता बनर्जी के लिए सबसे बड़ा सिरदर्द बन चुकी है। दरअसल, विधानसभा में विधायक दल का नया नेता चुनने के लिए जो बैठक बुलाई गई थी, उसमें एक बड़ा फर्जीवाड़ा सामने आया है।
प्रस्ताव पर कथित रूप से उन विधायकों के भी डिजिटल हस्ताक्षर पाए गए, जो उस दिन बैठक में उपस्थित ही नहीं थे। तृणमूल के दो बागी विधायकों ऋतब्रत बनर्जी और संदीपान साहा ने इस गंभीर धोखाधड़ी की लिखित शिकायत सीधे विधानसभा अध्यक्ष से कर दी।
ममता बनर्जी ने बागी विधायकों को पार्टी से निकाला बाहर
मामला बढ़ने पर सरकार ने इस पूरे घोटाले की उच्चस्तरीय जांच राज्य की सीआईडी टीम को सौंप दी है। मुख्यमंत्री ने जैसे ही इन दोनों विधायकों के नाम सार्वजनिक किए, उसके महज पंद्रह मिनट के भीतर ही दोनों को पार्टी विरोधी गतिविधियों के कारण निष्कासित कर दिया गया।
इस कार्रवाई के ठीक बाद पार्टी के पूर्व प्रवक्ता रिजू दत्त ने एक बड़ा दावा ठोक दिया। उन्होंने पत्रकारों से कहा कि उनके पास पचास से अधिक विधायकों का मजबूत समर्थन है और उनका गुट ही राज्य में असली और वास्तविक तृणमूल कांग्रेस है।
इससे पहले अपनी बिखरती पार्टी को एकजुट करने के मकसद से ममता बनर्जी ने अपने निजी आवास पर तमाम विधायकों की एक आपात बैठक बुलाई थी। लेकिन उस महत्वपूर्ण बैठक में केवल बीस विधायक ही पहुंचे, जिसके कारण बैठक को रद्द करना पड़ा।
बीजेपी ने तृणमूल कांग्रेस पर कसा कड़ा तंज
ममता बनर्जी इन तमाम घटनाक्रमों और जांच एजेंसियों की बढ़ती गिरफ्तारियों के लिए सीधे तौर पर भारतीय जनता पार्टी को जिम्मेदार ठहरा रही हैं। उनका गंभीर आरोप है कि उनके विधायकों को केंद्रीय जांच एजेंसियों के डर से लगातार धमकियां और पैसों का लालच दिया जा रहा है।
दूसरी तरफ बीजेपी के नवनिर्वाचित विधायक रितेश तिवारी ने इन आरोपों पर कड़ा पलटवार किया है। उन्होंने कहा कि तृणमूल कांग्रेस कोई राजनीतिक दल नहीं, बल्कि स्वार्थी तत्वों का एक जमावड़ा थी। अब सत्ता जाने के बाद इस अपवित्र गठबंधन का अंत होना पूरी तरह स्वाभाविक है।
वरिष्ठ राजनीतिक विश्लेषकों का भी मानना है कि भ्रष्टाचार के मुकदमों से बचने के लिए कई नेता भविष्य में पाला बदल सकते हैं। हालांकि, ममता बनर्जी एक बेहद जुझारू और जमीनी नेता रही हैं। वे इस समय भी पार्टी को बचाने के लिए नई रणनीति पर काम कर रही हैं।
Author: Sourav Banerjee


