Delhi News: देश के युवाओं में वेपिंग और ई-सिगरेट का क्रेज तेजी से बढ़ रहा है। युवा इसे सिगरेट का सुरक्षित विकल्प मान रहे हैं। लेकिन डॉक्टर इसे एक बड़े कैंसर संकट की आहट बता रहे हैं। रंग-बिरंगे फ्लेवर में मिलने वाला यह जहर नई पीढ़ी के स्वास्थ्य को चुपचाप बर्बाद कर रहा है।
राजधानी दिल्ली के कैफे हों या मुंबई के दफ्तर, हर जगह युवा वेपिंग करते नजर आते हैं। वे आकर्षक उपकरणों और कैंडी फ्लेवर के जाल में फंस चुके हैं। अपोलो अस्पताल के डॉ. राजेश शिंदे के अनुसार यह आधुनिक जीवनशैली का दिखावा है। असल में यह एक बेहद खतरनाक और जानलेवा नशा है।
वैश्विक स्वास्थ्य आंकड़ों के मुताबिक 13 से 15 साल के करीब 37 मिलियन किशोर तंबाकू और ई-सिगरेट का सेवन कर रहे हैं। भारत के बड़े शहरों में भी यह चलन बढ़ा है। जिज्ञासा और दोस्तों के दबाव में युवा वेपिंग शुरू कर देते हैं। उन्हें लगता है कि धुएं की कमी के कारण यह सुरक्षित है।
वेपिंग से ओरल कैंसर का सीधा खतरा
ऑन्कोलॉजिस्ट डॉ. सिद्धार्थ तुर्कर बताते हैं कि ई-सिगरेट पीने वालों को ओरल कैंसर का भारी खतरा है। मुंह के अंदर सफेद धब्बे पड़ना इसका शुरुआती संकेत है, जिसे ल्यूकोप्लाकिया कहा जाता है। गर्म रसायनों और निकोटीन के लगातार संपर्क से गले और सांस की नली के नाजुक ऊतकों को गहरा नुकसान पहुंचता है।
वेपिंग का असर केवल मुंह तक सीमित नहीं है। यह फेफड़ों के कैंसर और गंभीर सांस की बीमारियों का भी बड़ा कारण बन रहा है। जो लोग सिगरेट और वेप दोनों पीते हैं, उनकी स्थिति सबसे ज्यादा खराब है। ऐसे मामलों में फेफड़ों की बीमारी और कैंसर का खतरा कई गुना बढ़ जाता है।
मानसिक स्वास्थ्य और बचाव के उपाय
शारीरिक नुकसान के अलावा यह मानसिक स्वास्थ्य पर भी बुरा असर डालता है। निकोटीन की लत युवाओं में भारी चिंता और खराब खानपान को जन्म दे रही है। भारत में ई-सिगरेट के उत्पादन और बिक्री पर सख्त रोक है। फिर भी इसके खतरे से बचने के लिए विज्ञान आधारित सही शिक्षा देना बहुत जरूरी है।
स्वास्थ्य विशेषज्ञों का मानना है कि इस भयंकर महामारी को रोकने का समय अभी बीता नहीं है। स्कूल और कॉलेज स्तर पर जागरूकता अभियान चलाने से बेहद सकारात्मक परिणाम मिल सकते हैं। डर पैदा करने के बजाय युवाओं को इसके वैज्ञानिक तथ्यों से वाकिफ कराना होगा। यही समय रहते बचाव का सही तरीका साबित हो सकता है।
ई-सिगरेट में मौजूद हानिकारक रसायन शरीर के अंदर धीरे-धीरे जहर घोलते हैं। युवाओं को यह समझना होगा कि बिना धुएं वाले उपकरण भी उतने ही जानलेवा हो सकते हैं। आज के समय में कैंसर के मरीजों की संख्या जिस तेजी से बढ़ रही है, उसमें इस नए नशे का बहुत बड़ा योगदान सामने आ रहा है।
Asha Thakur


