Andhra Pradesh News: आंध्र प्रदेश हाईकोर्ट ने कोमा में पड़े पति के बैंक खाते तक पत्नी की पहुंच सुनिश्चित करने का एक बड़ा फैसला सुनाया है। कडप्पा जिले की 59 वर्षीय नागम्मा के पास अपने बीमार पति के इलाज के लिए पैसे नहीं थे। कोर्ट ने मानवीय आधार पर उन्हें पति के बैंक खाते का कानूनी अभिभावक नियुक्त किया है।
नागम्मा के 65 वर्षीय पति लंबे समय से कोमा जैसी स्थिति में हैं। उन्हें सांस लेने के लिए ट्रैकियोस्टोमी ट्यूब और भोजन के लिए रॉयल ट्यूब की मदद लेनी पड़ती है। उनके एक्सिस बैंक खाते में 14.38 लाख रुपये जमा हैं, लेकिन बैंक नियमों के कारण नागम्मा इन पैसों को निकालने में पूरी तरह से असमर्थ थीं।
‘अर्धांगिनी’ का अर्थ और कानूनी अधिकार
जस्टिस वेंकटेश्वरलू निम्मागड्डा ने सुनवाई के दौरान भारतीय दर्शन के ‘अर्धांगिनी’ शब्द का गहरा अर्थ समझाया। कोर्ट ने कहा कि जब पति निर्णय लेने की क्षमता खो देता है, तो उसकी देखभाल के लिए पत्नी से बेहतर कोई और कानूनी या नैतिक अभिभावक नहीं हो सकता। यह आदेश उनके इलाज और घर के जरूरी खर्चों के लिए बेहद महत्वपूर्ण है।
राज्य सरकार ने इस याचिका का विरोध करते हुए कहा कि यह सिविल मामला है। हालांकि, हाईकोर्ट ने इस तर्क को खारिज कर दिया। कोर्ट ने अनुच्छेद 226 का उपयोग करते हुए यह स्पष्ट किया कि जीवन और गरिमा के अधिकार के लिए नागरिक सीधे हाईकोर्ट में आ सकते हैं। यह फैसला भविष्य के लिए एक मिसाल बनकर उभरा है।
कोर्ट ने रखीं निगरानी की शर्तें
अधिकार देने के साथ ही कोर्ट ने पारदर्शिता बरतने के भी निर्देश दिए हैं। नागम्मा को हर तीन महीने में बैंक खाते का स्टेटमेंट अदालत में पेश करना होगा। यह व्यवस्था एक साल की अवधि के लिए लागू रहेगी। इससे यह सुनिश्चित होगा कि बैंक खाते में मौजूद राशि का सही इस्तेमाल केवल पति के चिकित्सा कार्यों में ही हो रहा है।
यह फैसला उन परिवारों के लिए बड़ी राहत है जो इसी तरह की स्थिति से गुजर रहे हैं। बैंक के सख्त नियम कई बार मरीजों के इलाज में बाधा बनते हैं। हाईकोर्ट ने संवेदनशीलता दिखाते हुए कानूनी पचड़ों के ऊपर इंसानियत को रखा है। नागम्मा की जीत अब कई असहाय लोगों के लिए एक नई उम्मीद की किरण बन गई है।
Author: Rahul Sharma


