Delhi News: दिल्ली के मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने शराब नीति मामले में न्यायपालिका के खिलाफ मोर्चा खोलते हुए ‘सत्याग्रह’ का बिगुल फूंक दिया है। उन्होंने स्पष्ट किया है कि वे इस कानूनी लड़ाई के हर परिणाम को भुगतने के लिए पूरी तरह तैयार हैं। केजरीवाल का यह कदम भारतीय राजनीति में संवैधानिक संस्थाओं के प्रति बढ़ते अविश्वास का एक बड़ा संकेत माना जा रहा है। मुख्यमंत्री ने जस्टिस स्वर्ण कांता शर्मा की अदालत की कार्यवाही का बहिष्कार करने का सार्वजनिक निर्णय लिया है।
अदालत के बहिष्कार से उपजा अभूतपूर्व नैतिक संकट
मुख्यमंत्री अरविंद केजरीवाल ने दिल्ली हाई कोर्ट की न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा के समक्ष पेश होने से इनकार कर दिया है। उनके इस फैसले ने देश की न्यायपालिका के सामने एक गंभीर और अभूतपूर्व नैतिक संकट खड़ा कर दिया है। आम आदमी पार्टी के नेता इसे ‘गांधीवादी सत्याग्रह’ का नाम दे रहे हैं। अब सबकी निगाहें इस बात पर टिकी हैं कि उच्च न्यायालय इस खुली चुनौती और अदालती बहिष्कार पर क्या कड़ा रुख अपनाता है। राजनीतिक विश्लेषक इसे लोकतंत्र के लिए चिंताजनक स्थिति बता रहे हैं।
जस्टिस शर्मा पर पक्षपात के आरोप और याचिका खारिज
केजरीवाल ने जस्टिस शर्मा पर गंभीर आरोप लगाते हुए उनसे सुनवाई से अलग होने की लिखित मांग की थी। उन्होंने दावा किया कि न्यायाधीश एक विशेष विचारधारा वाले संगठन के कार्यक्रमों में सक्रिय रही हैं। साथ ही, उन्होंने उनके बेटे के केंद्र सरकार के वकीलों की सूची में होने का मुद्दा भी उठाया। हालांकि, न्यायमूर्ति स्वर्ण कांता शर्मा ने इन सभी आरोपों को निराधार बताते हुए केजरीवाल की याचिका को खारिज कर दिया। अदालत ने स्पष्ट किया कि न्याय प्रक्रिया किसी भी दबाव या व्यक्तिगत आरोपों से प्रभावित नहीं होगी।
सुप्रीम कोर्ट की दहलीज पर टिके केजरीवाल के अगले कदम
हाई कोर्ट से राहत न मिलने के बाद अब अरविंद केजरीवाल ने देश की सर्वोच्च अदालत यानी सुप्रीम कोर्ट का दरवाजा खटखटाने का मन बनाया है। ‘आप’ कानूनी टीम का मानना है कि केवल उच्चतम न्यायालय ही इस जटिल विवाद का कोई सम्मानजनक और संवैधानिक समाधान निकाल सकता है। यदि सुप्रीम कोर्ट से भी मुख्यमंत्री को कोई राहत नहीं मिलती है, तो न्यायपालिका और कार्यपालिका के बीच यह टकराव आने वाले समय में बेहद गंभीर और दूरगामी परिणाम पैदा कर सकता है।


