World News: पश्चिम एशिया (मिडिल ईस्ट) में भड़की युद्ध की आग अब पूरी दुनिया को अपनी चपेट में ले चुकी है। इस संघर्ष ने एक भयानक वैश्विक तेल संकट (ग्लोबल ऑयल क्राइसिस) को जन्म दे दिया है। हालात इतने बेकाबू हो गए हैं कि पाकिस्तान, श्रीलंका, म्यांमार, वियतनाम और फिलीपींस जैसे देशों से लेकर जर्मनी जैसे ताकतवर मुल्क तक में ‘एनर्जी लॉकडाउन’ की नौबत आ गई है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की सप्लाई चेन बुरी तरह टूट चुकी है। इसके परिणामस्वरूप पेट्रोल, डीजल, एलपीजी और सीएनजी की कीमतों ने इतिहास के सारे रिकॉर्ड ध्वस्त कर दिए हैं। आम आदमी की रसोई से लेकर उद्योगों के पहिये तक, सब कुछ इस संकट की भेंट चढ़ रहा है।
आसमान छूते तेल के दाम, ठप पड़ी सप्लाई चेन
मिडिल ईस्ट में जारी तनाव ने समुद्री व्यापार मार्गों को असुरक्षित कर दिया है। तेल के बड़े टैंकर अब लंबे और महंगे रास्तों से गुजरने को मजबूर हैं। इससे कच्चे तेल की ढुलाई का खर्च कई गुना बढ़ गया है। दुनिया भर की तेल कंपनियों ने सप्लाई में भारी कटौती कर दी है। इस कमी का सीधा असर पेट्रोल पंपों और गैस एजेंसियों पर दिख रहा है। पेट्रोल और सीएनजी की कीमतें आम आदमी की पहुंच से बाहर होती जा रही हैं। रसोई गैस के दाम बढ़ने से मध्यम वर्ग का बजट पूरी तरह बिगड़ गया है।
पाकिस्तान और श्रीलंका में त्राहिमाम, राशनिंग की नौबत
पड़ोसी देश पाकिस्तान और श्रीलंका में हालात सबसे ज्यादा खराब हैं। इन देशों के पास तेल आयात करने के लिए विदेशी मुद्रा का भारी संकट है। पाकिस्तान में पेट्रोल पंपों पर लंबी लाइनें लगी हैं। बिजलीघरों को ईंधन नहीं मिल रहा है, जिससे घंटों की बिजली कटौती हो रही है। श्रीलंका में भी सरकार ने तेल की राशनिंग शुरू कर दी है। म्यांमार और वियतनाम में भी फैक्ट्रियां ऊर्जा की कमी के कारण बंद होने की कगार पर पहुंच गई हैं। फिलीपींस में आसमान छूती महंगाई ने आम जनता की कमर तोड़ दी है।
जर्मनी जैसे ताकतवर मुल्क में ‘एनर्जी लॉकडाउन’ का खौफ
यह संकट केवल गरीब या विकासशील देशों तक सीमित नहीं है। यूरोप की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था जर्मनी भी इस ऑयल क्राइसिस से कांप उठा है। जर्मनी में प्राकृतिक गैस और तेल की कीमतों में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई है। वहां की सरकार ऊर्जा बचाने के लिए कड़े कदम उठा रही है। कई बड़े उद्योगों ने अपना उत्पादन कम कर दिया है। यूरोप में ‘एनर्जी लॉकडाउन’ का डर अब एक कड़वी सच्चाई में बदलता जा रहा है। ऊर्जा का यह भारी संकट पश्चिमी देशों के लिए बहुत बड़ा सिरदर्द बन गया है।


