मद्रास हाईकोर्ट की सख्त टिप्पणी, VIP दर्शन पर उठे सवाल; कहा- क्या भगवान सिर्फ मंत्रियों का इंतजार करते हैं?

Tamil Nadu News: मद्रास हाईकोर्ट ने मंदिरों में वीआईपी दर्शन व्यवस्था को लेकर कड़ी मौखिक टिप्पणी की है। अदालत ने सवाल उठाया कि जब भगवान के सामने सभी श्रद्धालु समान हैं, तो फिर VIP दर्शन जैसी अलग व्यवस्था की आवश्यकता क्यों है। कोर्ट ने कहा कि ऐसी व्यवस्थाओं के कारण आम भक्तों को लंबे समय तक इंतजार करना पड़ता है।

यह टिप्पणी जस्टिस जी. आर. स्वामीनाथन और जस्टिस वी. लक्ष्मीनारायणन की खंडपीठ ने 29 मई को सुनवाई के दौरान की। अदालत मंदिरों में VIP और विशेष दर्शन व्यवस्था समाप्त करने की मांग वाली याचिका पर विचार कर रही थी। सुनवाई के दौरान न्यायाधीशों ने मंदिरों में आम श्रद्धालुओं और विशेष व्यक्तियों के लिए अलग व्यवस्था पर गंभीर सवाल उठाए।

भगवान के सामने सभी श्रद्धालु समान हैं

सुनवाई के दौरान बेंच ने कहा कि मंत्रियों और विधायकों को यह संदेश नहीं जाना चाहिए कि वे किसी भी समय मंदिर पहुंच सकते हैं और भगवान उनकी प्रतीक्षा कर रहे होंगे। अदालत ने स्पष्ट शब्दों में पूछा कि VIP दर्शन की जरूरत आखिर क्यों है, जबकि धार्मिक मान्यताओं के अनुसार भगवान के समक्ष सभी लोग समान माने जाते हैं।

याचिका में मांग की गई है कि वरिष्ठ नागरिकों, दिव्यांगजनों, गर्भवती महिलाओं, नवविवाहित जोड़ों, मंदिर कला से जुड़े कलाकारों, संवैधानिक पदाधिकारियों और राज्य के प्रमुखों को छोड़कर अन्य सभी के लिए VIP तथा विशेष दर्शन व्यवस्था समाप्त की जाए। याचिकाकर्ता का कहना है कि मौजूदा व्यवस्था समानता के सिद्धांत के विपरीत है।

मंत्री के दौरे को लेकर भी उठे सवाल

सुनवाई के दौरान हाईकोर्ट ने यह भी जानना चाहा कि क्या 15 मई को किसी मंत्री के दर्शन के कारण तिरुपरंकुंद्रम सुब्रमण्यस्वामी मंदिर के बंद होने का समय बढ़ाया गया था। इस सवाल पर राज्य सरकार की ओर से अतिरिक्त महाधिवक्ता पी. वी. बालासुब्रमण्यम ने अदालत को बताया कि मंदिर के निर्धारित समय में कोई बदलाव नहीं किया गया था।

राज्य सरकार ने अदालत के समक्ष इस संबंध में एक रिपोर्ट भी प्रस्तुत की। इसके बाद अतिरिक्त महाधिवक्ता ने जवाबी हलफनामा दाखिल करने के लिए समय मांगा। अदालत ने यह अनुरोध स्वीकार कर लिया और मामले की अगली सुनवाई छह सप्ताह बाद तय कर दी।

VHP पदाधिकारी ने दायर की है याचिका

यह याचिका विश्व हिंदू परिषद की उत्तर तमिलनाडु इकाई के अध्यक्ष पी. चोक्कलिंगम ने दायर की है। याचिकाकर्ता का कहना है कि हिंदू धार्मिक एवं धर्मार्थ बंदोबस्ती अधिनियम की धारा 6(15)(b) के तहत उनकी याचिका विचार योग्य है और इस मुद्दे पर न्यायिक हस्तक्षेप आवश्यक है।

याचिका में कहा गया है कि सनातन धर्म किसी व्यक्ति के साथ जाति, आर्थिक स्थिति, सामाजिक प्रतिष्ठा या अन्य आधारों पर भेदभाव करने की शिक्षा नहीं देता। चोक्कलिंगम ने तर्क दिया कि मंदिरों में अमीर-गरीब या VIP और सामान्य श्रद्धालुओं के बीच अलग व्यवस्था धार्मिक समानता की मूल भावना के अनुरूप नहीं है।

Author: Karthik Srinivasan

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