गुजरात हाई कोर्ट का मानवीय फैसला: ड्यूटी के दौरान जान गंवाने वाले बस कर्मचारी के परिजनों को मिलेगा मुआवजा

Ahmedabad News: गुजरात हाई कोर्ट ने एक महत्वपूर्ण फैसला सुनाते हुए राज्य परिवहन निगम को मृतक कर्मचारी के परिवार को मुआवजा देने का आदेश दिया है। कोर्ट ने ‘रोजगार के काल्पनिक विस्तार’ (Notional Extension of Employment) के सिद्धांत का उपयोग करते हुए 6.52 लाख रुपये का मुआवजा बरकरार रखा है। यह निर्णय मृतक मगनभाई के परिवार के लिए बड़ी राहत लेकर आया है।

यह दुखद हादसा 31 मई 2008 की रात को घोड़ासर बस स्टेशन पर हुआ था। बस स्टेशन पर विश्राम गृह (Rest Room) की कोई सुविधा उपलब्ध न होने के कारण कर्मचारी को बस की छत पर सोना पड़ा था। नींद में करवट बदलने के दौरान गिरने से उनकी मृत्यु हो गई थी। कर्मचारी अपने पीछे पत्नी और दो बच्चों को छोड़ गए हैं।

परिवहन निगम की दलीलें और कोर्ट का कड़ा रुख

गुजरात राज्य परिवहन निगम ने मुआवजे का विरोध करते हुए तर्क दिया कि यह हादसा सक्रिय ड्यूटी के घंटों के बाहर हुआ था। निगम का दावा था कि कर्मचारी को बस की सुरक्षा के लिए केबिन के अंदर सोना चाहिए था, न कि छत पर। हालांकि, कोर्ट ने इन दलीलों को पूरी तरह से निराधार मानते हुए खारिज कर दिया।

हाई कोर्ट ने स्पष्ट किया कि ड्राइवर और कंडक्टर को बस की सुरक्षा के लिए ‘नाइट अलाउंस’ दिया जाता है। इस आधार पर, रात में बस के साथ रुकना उनकी आधिकारिक ड्यूटी का ही एक अनिवार्य हिस्सा है। कोर्ट ने निगम से पूछा कि यदि वहां विश्राम गृह नहीं था, तो कर्मचारी को वैकल्पिक सुरक्षा कहाँ दी गई थी?

प्रशासनिक जवाबदेही और न्यायिक मिसाल

कोर्ट ने अपनी टिप्पणी में कहा कि निगम ऐसा कोई भी नियम या दस्तावेज़ पेश करने में विफल रहा, जो चालकों को बस की छत पर सोने से प्रतिबंधित करता हो। विश्राम गृहों के अभाव में सुरक्षा की जिम्मेदारी पूरी तरह से निगम की बनती है। यह फैसला सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों के लिए एक कड़ा संदेश है कि कर्मचारियों की सुरक्षा और बुनियादी सुविधाएँ सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए।

यह फैसला ‘रोजगार के काल्पनिक विस्तार’ के सिद्धांत को कानूनी रूप से और मजबूत करता है। इसका अर्थ यह है कि यदि कोई कर्मचारी कार्यस्थल पर मौजूद है और अपने कर्तव्यों का पालन कर रहा है, तो उस दौरान होने वाली कोई भी दुर्घटना नियोक्ता की जिम्मेदारी के दायरे में आती है। परिवार के लिए यह न्याय वर्षों के संघर्ष के बाद आया है।

Author: Sachin Kulkarni

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