Himachal Pradesh News: हिमाचल प्रदेश के धर्मशाला में भूवैज्ञानिकों को एक बहुत बड़ी कामयाबी मिली है। विश्व पर्यावरण दिवस के मौके पर छावनी क्षेत्र के पास बलुआ पत्थरों के बीच लगभग दो करोड़ वर्ष पुराना ताड़ के पत्ते यानी पाम का दुर्लभ जीवाश्म मिला है। इस अद्भुत खोज से वैज्ञानिक काफी उत्साहित हैं।
प्रसिद्ध भूविज्ञानी डॉ. रितेश आर्य ने अपनी खोजी नजरों से इस ऐतिहासिक जीवाश्म को ढूंढ निकाला है। इस प्राचीन पत्थर पर ताड़ के पत्ते की बारीक शिराएं आज भी पूरी तरह साफ दिखाई दे रही हैं। लखनऊ के बीरबल साहनी पुराविज्ञान संस्थान ने भी जांच के बाद इस खोज की आधिकारिक पुष्टि की है।
करोड़ों साल पहले बहुत गर्म था आज का ठंडा हिमालय
वैज्ञानिकों के अनुसार इतनी नाजुक संरचना का करोड़ों वर्षों तक सुरक्षित रहना एक चमत्कार है। यह दुर्लभ जीवाश्म इस बात का पुख्ता वैज्ञानिक सबूत है कि आज का बर्फीला और ठंडा हिमालय करीब बीस मिलियन साल पहले बेहद गर्म क्षेत्र हुआ करता था। तब यहां उष्णकटिबंधीय जलवायु मौजूद थी।
इस खोज ने उन्नीसवीं सदी के महान भूविज्ञानी हेनरी बेनेडिक्ट मेडलीकॉट की यादें ताजा कर दी हैं। उन्होंने सबसे पहले हिमाचल के कसौली क्षेत्र से ऐसे ही पौधों के प्राचीन जीवाश्म खोजे थे। वर्तमान में लद्दाख और कसौली से मिले कई दुर्लभ जीवाश्म डंगयारी के टेथिस फॉसिल म्यूजियम में सुरक्षित रखे गए हैं।
जीवाश्म स्थल को पर्यटन क्षेत्र बनाने की उठी मांग
डॉ. आर्य ने इस खोज को आधुनिक जलवायु परिवर्तन और पर्यावरण संरक्षण से जोड़ा है। उन्होंने सरकार और स्थानीय प्रशासन से इस ऐतिहासिक स्थल को तुरंत सुरक्षित करने की मांग की है। उन्होंने कहा कि इस पूरे क्षेत्र को जियोहेरिटेज और जियोटूरिज्म स्थल के रूप में विकसित किया जाना चाहिए।
इस कदम से आने वाली नई पीढ़ी, शोधकर्ताओं और कॉलेज के छात्रों को प्रकृति के इस प्राचीन इतिहास को करीब से सीखने का मौका मिलेगा। यदि समय रहते इसे संरक्षित नहीं किया गया, तो पर्यावरण के इस अनमोल खजाने और अमूल्य वैज्ञानिक इतिहास को हमेशा के लिए नुकसान पहुंच सकता है।
Author: Sunita Gupta


