Delhi News: देश की राजधानी दिल्ली से मातृत्व और प्रजनन अधिकारों से जुड़ा एक बेहद भावुक और ऐतिहासिक कानूनी फैसला सामने आया है। दिल्ली हाई कोर्ट ने एक 50 वर्षीय महिला को अपने क्रायोप्रिजर्व्ड (सुरक्षित रखे गए) भ्रूणों का उपयोग करने की बड़ी अनुमति दे दी है।
हाई कोर्ट के न्यायमूर्ति पुरुषेंद्र कुमार कौरव की एकल पीठ ने इस मामले पर एक बेहद संवेदनशील और महत्वपूर्ण टिप्पणी की। अदालत ने साफ शब्दों में जोर देकर कहा कि सुरक्षित रखे गए भ्रूण याचिकाकर्ताओं के प्रजनन स्वायत्तता और संवैधानिक रूप से संरक्षित पारिवारिक जीवन के अधिकार से गहराई से जुड़े हैं।
तकनीकी नियमों में नहीं बांध सकते मातृत्व
माननीय अदालत ने अपने फैसले में स्पष्ट किया कि किसी भी महिला के प्रजनन अधिकारों और उसकी मातृत्व की पवित्र इच्छा को केवल तकनीकी बाधाओं और सख्त नियमों के दायरे तक सीमित नहीं किया जा सकता। अदालत ने कहा कि मातृत्व की इच्छा एक महिला का मौलिक और संवैधानिक अधिकार है।
पीड़ित महिला और उनके पति द्वारा दायर संयुक्त याचिका को स्वीकार करते हुए अदालत ने एक महत्वपूर्ण बिंदु को रेखांकित किया। पीठ ने कहा कि जब महिला के भ्रूण को सुरक्षित (निकालने) किया गया था, तब वह कानून द्वारा निर्धारित आयु सीमा के बिल्कुल भीतर थीं।
इलाज बीच में रोकना नाइंसाफी
हाई कोर्ट ने कहा कि ऐसी स्थिति में चिकित्सा उपचार की प्रक्रिया को केवल उम्र का हवाला देकर बीच में रोकना कहीं से भी उचित और न्यायसंगत नहीं है। सहायता प्राप्त प्रजनन प्रौद्योगिकी (ART) अधिनियम का मुख्य उद्देश्य वैध रूप से शुरू किए गए इलाज में बाधा डालना कतई नहीं है।
इस भावुक मामले के पीछे एक गहरा पारिवारिक दर्द छिपा हुआ था। याचिकाकर्ता दंपति ने मई 2025 में अपने इकलौते बेटे को हमेशा के लिए खो दिया था। इस गहरे सदमे से उबरने और वंश को आगे बढ़ाने के लिए बुजुर्ग दंपति ने आईवीएफ (IVF) उपचार कराने का एक बड़ा फैसला लिया था।
अस्पताल ने इलाज से कर दिया था मना
आईवीएफ के पहले चक्र के दौरान महिला के गर्भ में भ्रूण स्थानांतरण की प्रक्रिया पूरी तरह असफल रही थी। इसके बाद जब पीड़ित दंपति ने अस्पताल से अपने शेष बचे पांच क्रायोप्रिजर्व्ड भ्रूणों का उपयोग करने की मांग की, तो डॉक्टरों और अस्पताल प्रबंधन ने साफ इन्कार कर दिया था।
अस्पताल प्रशासन ने दलील दी थी कि महिला अब कानूनन 50 वर्ष की आयु सीमा को पार कर चुकी है, इसलिए वह आगे का इलाज नहीं कर सकते। इसी मेडिकल गाइडलाइन और अस्पताल के कड़े फैसले के खिलाफ बुजुर्ग दंपति ने न्याय के लिए हाई कोर्ट का दरवाजा खटखटाया था।
न्याय की हुई बड़ी जीत
दंपति को एक बड़ी राहत देते हुए हाई कोर्ट की पीठ ने रिकॉर्ड दर्ज किया कि जब महिला के भ्रूण निकाले गए थे, तब उनकी सही उम्र 49 वर्ष, 11 महीने और 14 दिन थी। आज भले ही याचिकाकर्ता महिला की उम्र 50 वर्ष 2 महीने हो चुकी है, लेकिन वह किसी नए भ्रूण की मांग नहीं कर रही हैं।
अदालत ने माना कि चूंकि सुरक्षित रखे गए पुराने भ्रूणों का ही इस्तेमाल होना है, इसलिए इसमें कोई भी कानूनी अड़चन पैदा नहीं होनी चाहिए। हाई कोर्ट के इस ऐतिहासिक और मानवीय फैसले के बाद अब पीड़ित बुजुर्ग मां की सूनी गोद एक बार फिर भरने की उम्मीद जग गई है।
Author: Gaurav Malhotra


