Delhi News: हिंदू धर्म और भारतीय समाज में माता-पिता को भगवान से भी ऊंचा दर्जा दिया गया है। खासकर पिता को पूरे परिवार का आसरा, अनुशासन और सुरक्षा देने वाली एक मजबूत छत के रूप में देखा जाता है। ज्योतिष शास्त्र में सूर्य देव को साक्षात पिता का कारक माना गया है।
ज्योतिष के अनुसार पिता के साथ आपके संबंध जितने मधुर होंगे, आपकी कुंडली में सूर्य उतने ही मजबूत होंगे। हमारी पुरानी मान्यताओं में बेटों के लिए कुछ बहुत जरूरी नियम बनाए गए हैं। इन नियमों को मानने से न केवल पिता का सम्मान बढ़ता है, बल्कि घर में सुख-समृद्धि आती है।
पितृ कर्म और मुख्य यजमान का अधिकार
सनातन परंपरा के अनुसार जब तक घर में पिता जीवित हैं, तब तक पूर्वजों के श्राद्ध, तर्पण या पिंडदान करने का पहला अधिकार सिर्फ पिता का ही होता है। पिता की मौजूदगी में बेटे का खुद आगे बढ़कर ये काम करना शास्त्रों में वर्जित और अनुचित माना गया है।
इसके अलावा घर-परिवार की भलाई के लिए होने वाले किसी भी बड़े हवन, यज्ञ या अनुष्ठान में मुख्य यजमान की गद्दी पर बैठने का पहला हक पिता का होता है। पिता की साक्षात मौजूदगी में बेटों को मुख्य यजमान के आसन पर बैठने से हमेशा बचना चाहिए।
पुरानी लोक परंपराएं और मर्यादित रहन-सहन
एक पुरानी लोक परंपरा के अनुसार, जब तक पिता जीवित रहते हैं, तब तक बेटों को अपनी मूंछ पूरी तरह साफ यानी क्लीन शेव नहीं करवानी चाहिए। प्राचीन समय में इसे मर्यादा से जोड़कर देखा जाता था। आज के दौर में यह कड़ा नियम नहीं है, लेकिन बुजुर्ग इसे आज भी मानते हैं।
इसके साथ ही किसी भी सामाजिक कार्य या दान-पुण्य की रसीद कटवाते समय हमेशा अपने नाम से पहले पिता का नाम आगे रखना चाहिए। यह सुंदर परंपरा इंसान के भीतर छिपे अहंकार को पूरी तरह खत्म करती है और परिवार में आपसी आदर का भाव बढ़ाती है।
समाज के सामने पिता की बात को काटना
व्यावहारिक जीवन में कभी भी चार लोगों के सामने या समाज के बीच अपने पिता की बात को काटना या उन्हें टोकना नहीं चाहिए। अगर किसी विषय पर मतभेद हो भी, तो उसे घर के अंदर शांति से बैठकर सुलझाना ही एक संस्कारी और अच्छे बेटे की पहचान होती है।
Author: Pandit Balkrishan Sharma


