Spiritual News: भारतीय अध्यात्म और संत परंपरा में महान समाज सुधारक संत कबीरदास का नाम सर्वोच्च स्थान पर आता है। कबीरदास जी के प्रसिद्ध दोहे केवल प्राचीन साहित्य का हिस्सा मात्र नहीं हैं। इन कालजयी दोहों के माध्यम से उन्होंने मानव जाति को सफल जीवन जीने का बेहतरीन सूत्र दिया है।
यदि कोई व्यक्ति कबीरदास जी के इन प्रसिद्ध दोहों का सही व्यावहारिक अर्थ समझ ले तो उसका जीवन संवर सकता है। यह ज्ञान मनुष्य को सही राह दिखाने वाले किसी अनमोल रत्न से कम नहीं है। कबीरदास ने बेहद सरल भाषा में सांसारिक जीवन के सबसे गहरे सत्यों को उजागर किया है।
उनके मधुर उपदेश आज भी समाज में उतने ही प्रासंगिक हैं जितने सदियों पहले थे। कबीर के विचार हमें मन का अहंकार छोड़ने, धैर्य अपनाने और सच्चाई के मार्ग पर आगे बढ़ने की निरंतर प्रेरणा देते हैं। आज हम कबीरदास के ऐसे ही दस विशेष दोहों का गूढ़ रहस्य जानेंगे।
परनिंदा त्यागकर आत्मचिंतन करने की सीख देता है पहला दोहा
बुरा जो देखन मैं चला, बुरा न मिलिया कोय। जो दिल खोजा आपना, मुझसे बुरा न कोय॥ कबीरदास जी के इस प्रथम दोहे का आध्यात्मिक अर्थ बहुत ही व्यापक है। वे कहते हैं कि दूसरों की कमियां और गलतियां खोजने से पहले हमें हमेशा अपने स्वयं के भीतर झांकना चाहिए।
जब हम पूरी ईमानदारी से अपना आत्मचिंतन करते हैं तो हमें खुद से बुरा कोई दिखाई नहीं देता। समाज में रहने वाले प्रत्येक मनुष्य के लिए आत्मअवलोकन ही आत्मविकास का पहला कदम होता है। दूसरों को सुधारने की बजाय हमें स्वयं की त्रुटियों को दूर करने का प्रयास करना चाहिए।
धीरे-धीरे रे मना, धीरे सब कुछ होय। माली सींचे सौ घड़ा, ऋतु आए फल होय॥ कबीरदास इस दोहे के जरिए समझाते हैं कि जीवन में मनचाही सफलता पाने के लिए निरंतर धैर्य बनाए रखना बहुत आवश्यक है। संसार में हर छोटे-बड़े कार्य का अपना एक निश्चित समय होता है।
जिस प्रकार किसी पौधे को माली चाहे सौ घड़े पानी से सींच दे, लेकिन उस पर फल सही मौसम आने पर ही लगते हैं। उसी प्रकार मनुष्य को अपनी कठिन मेहनत के साथ-साथ सही समय का इंतजार भी करना चाहिए। जल्दबाजी करने से कोई भी काम सिद्ध नहीं होता है।
समय प्रबंधन और कर्म की महत्ता बताता है तीसरा सूत्र
काल करे सो आज कर, आज करे सो अब। पल में प्रलय होएगी, बहुरि करेगा कब॥ कबीरदास जी के इस अद्भुत दोहे में समय प्रबंधन का सबसे बड़ा सूत्र छिपा है। किसी भी जरूरी काम को भविष्य के भरोसे टालना मनुष्य की सबसे बड़ी भूल मानी जाती है।
जो काम हमें कल करना है, उसे आज ही पूरा कर लेना चाहिए। जो आज करना है, उसे इसी पल समाप्त कर देना बुद्धिमानी है। जीवन का कोई भरोसा नहीं है, अगले ही पल प्रलय या मृत्यु आ सकती है। फिर आप अपना अधूरा कार्य कब पूरा कर पाएंगे।
पोथी पढ़ि पढ़ि जग मुआ, पंडित भया न कोय। ढाई आखर प्रेम का, पढ़े सो पंडित होय॥ केवल बड़ी-बड़ी धार्मिक या सांसारिक किताबों को पढ़ लेने से कोई भी मनुष्य सच्चा ज्ञानी नहीं बन पाता। पुस्तकीय ज्ञान व्यक्ति को अहंकारी बना सकता है, लेकिन आध्यात्मिक रूप से समृद्ध नहीं करता।
कबीरदास जी के अनुसार वास्तविक रूप से ज्ञानी और पंडित वही व्यक्ति कहलाता है जिसने अपने जीवन में प्रेम, करुणा और सच्ची मानवता को आत्मसात किया हो। संपूर्ण सृष्टि और प्राणिमात्र से निस्वार्थ प्रेम करना ही ज्ञान की पराकाष्ठा है। यही जीवन का अंतिम सत्य भी माना जाता है।
सुख और दुख में ईश्वर को समान रूप से याद रखने की सीख
दुख में सुमिरन सब करे, सुख में करे न कोय। जो सुख में सुमिरन करे, दुख काहे को होय॥ कबीरदास जी कहते हैं कि जब व्यक्ति पर संकट या दुख आता है तो वह ईश्वर को याद करने लगता है। लेकिन सुख के दिनों में वह भगवान को पूरी तरह भूल जाता है।
यदि मनुष्य अपने अच्छे समय या सुख के दिनों में भी परमात्मा का ध्यान पूरी निष्ठा से करता रहे, तो उसके जीवन में कभी कोई बड़ा दुख आएगा ही नहीं। ईश्वर की भक्ति केवल संकटकाल की वस्तु नहीं है, बल्कि उसे हर परिस्थिति में याद रखना चाहिए।
ऐसी वाणी बोलिए, मन का आपा खोय। औरन को शीतल करे, आपहुं शीतल होय॥ समाज में मधुर वाणी का बहुत बड़ा महत्व है। मीठी बोली से बिगड़े हुए रिश्ते भी तुरंत सुधर जाते हैं। हमें अपने अहंकार को त्यागकर हमेशा अत्यंत सौम्य और मीठे वचनों का प्रयोग करना चाहिए।
मधुर वाणी बोलने से सुनने वाले व्यक्ति के मन को परम शांति और शीतलता का अनुभव होता है। इसके साथ ही ऐसी सात्विक भाषा बोलने वाला मनुष्य स्वयं भी आंतरिक प्रसन्नता का अनुभव करता है। मीठे बोल से समाज में मान-सम्मान और यश की प्राप्ति होती है।
कठिन परिश्रम और निंदा करने वालों के प्रति कबीर के विचार
जिन खोजा तिन पाईया, गहरे पानी पैठ। मैं बपुरा बूडन डरा, रहा किनारे बैठ॥ जो साहसी लोग जीवन में जोखिम उठाते हैं और अथक परिश्रम करते हैं, उन्हें सफलता रूपी मोती अवश्य मिलता है। इसके लिए मनुष्य को गहरे समंदर में गोता लगाने का साहस दिखाना पड़ता है।
इसके विपरीत जो लोग डूबने के डर से केवल किनारे पर ही बैठे रह जाते हैं, वे जीवनभर कुछ भी हासिल नहीं कर पाते। कबीरदास जी कहते हैं कि सफलता पाने के लिए कायरता छोड़कर कर्म के सागर में उतरना ही एकमात्र रास्ता है। मेहनत का कोई विकल्प नहीं होता।
निंदक नियरे राखिए, आंगन कुटी छवाय। बिन पानी साबुन बिना, निर्मल करे सुभाय॥ कबीरदास जी का यह मत है कि हमारी आलोचना करने वाले लोगों को हमेशा अपने सबसे पास रखना चाहिए। यदि संभव हो तो उनके रहने की व्यवस्था अपने घर के आंगन में ही कर देनी चाहिए।
ऐसे आलोचक बिना पानी और बिना साबुन के हमारी कमियों को उजागर करके हमारे स्वभाव को पूरी तरह निर्मल और स्वच्छ बना देते हैं। अपनी बुराई सुनकर क्रोधित होने के बजाय हमें अपनी कमियों को सुधारने का एक बेहतरीन और नया अवसर मिलता है।
अहंकार का सर्वनाश और ईश्वर प्राप्ति का मार्ग
माटी कहे कुम्हार से, तू क्या रौंदे मोय। एक दिन ऐसा आएगा, मैं रौंदूंगी तोय॥ इस नश्वर संसार में किसी भी मनुष्य को अपनी शक्ति, पद या धन-दौलत पर कभी अहंकार नहीं करना चाहिए। समय बहुत बलवान है और वह सबको एक दिन अपनी वास्तविक हैसियत दिखा देता है।
मिट्टी कुम्हार से कहती है कि आज तू मुझे अपने पैरों से रौंद रहा है, लेकिन याद रख एक दिन ऐसा समय भी आएगा जब तू खुद मरकर इसी मिट्टी में विलीन हो जाएगा। तब मैं तुझे अपने अंदर समेटकर रौंदूंगी। यह सृष्टि का अटल नियम है।
जब मैं था तब हरि नहीं, अब हरि हैं मैं नाहिं। प्रेम गली अति सांकरी, तामें दो न समाहिं॥ कबीरदास जी कहते हैं कि जब तक मेरे भीतर ‘मैं’ यानी अहंकार की भावना मौजूद थी, तब तक मुझे ईश्वर के दर्शन नहीं हुए थे। अब मेरे भीतर से अहंकार पूरी तरह समाप्त हो गया है।
अहंकार मिटते ही मुझे सर्वत्र परमात्मा के साक्षात दर्शन होने लगे हैं। प्रभु प्रेम और भक्ति की यह गली अत्यंत संकरी है। इस संकीर्ण मार्ग पर एक साथ दो चीजें कभी नहीं समा सकतीं। ईश्वर को पाने के लिए मनुष्य को अपने अहम का पूर्ण त्याग करना ही होगा।
Author: Pandit Balkrishan Sharma

