सुप्रीम कोर्ट का ऐतिहासिक फैसला: लिव-इन पार्टनर को छोड़ना अब अपराध नहीं, लेकिन बच्चे का क्या होगा?

New Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने लिव-इन रिलेशनशिप को लेकर एक बेहद अहम फैसला सुनाया है। अदालत ने साफ किया है कि पार्टनर को छोड़कर जाना कोई अपराध नहीं है। आपसी सहमति से बने रिश्ते से बाहर निकलने पर धोखाधड़ी का मुकदमा नहीं चलेगा। इस बड़े फैसले ने देश में रहने वाले लाखों युवाओं को कानूनी राहत दी है। इसके साथ ही शीर्ष अदालत ने बच्चों के अधिकारों की भी पूरी तरह रक्षा की है।

धोखाधड़ी का केस दर्ज नहीं होगा

सुप्रीम कोर्ट ने एक अहम मामले की सुनवाई करते हुए यह ऐतिहासिक आदेश दिया है। अदालत ने कहा कि लिव-इन रिश्ता टूटने पर अब कोई आपराधिक मामला नहीं बनता है। अक्सर रिश्ते खत्म होने पर महिलाएं पार्टनर पर शादी का झांसा देने का केस करती हैं। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि जब रिश्ता सहमति से बना था, तो टूटना धोखा नहीं है। पुलिस इन मामलों में सीधे एफआईआर दर्ज करके तुरंत कोई सख्त कार्रवाई नहीं कर सकती है।

बच्चे के अधिकारों पर कोर्ट सख्त

पार्टनर को छोड़ने की आजादी भले ही मिल गई हो, लेकिन अदालत बच्चों के लिए सख्त है। सुप्रीम कोर्ट ने कहा कि लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा हुए बच्चे का अधिकार सुरक्षित रहेगा। उस मासूम बच्चे को समाज में एक वैध संतान का पूरा दर्जा और सम्मान मिलेगा। पिता को उस बच्चे के भरण-पोषण और शिक्षा की पूरी जिम्मेदारी उठानी ही होगी। अगर पिता जिम्मेदारी से भागता है, तो कानून उसके खिलाफ बहुत सख्त कार्रवाई करेगा।

संपत्ति में भी मिलेगा पूरा हिस्सा

लिव-इन रिलेशनशिप से पैदा बच्चों को पैतृक संपत्ति में पूरा हक मिलेगा। अदालत ने पुराने कानूनों का हवाला देकर इस नियम को स्पष्ट कर दिया है। ऐसे बच्चे को पिता की संपत्ति में कानूनी वारिस के रूप में माना जाएगा। यह फैसला उन बच्चों के लिए बड़ी राहत है, जिन्हें बेसहारा छोड़ दिया जाता था। कानून अब ऐसे बच्चों को समाज में आर्थिक सुरक्षा प्रदान करने के लिए पूरी तरह से प्रतिबद्ध है।

झूठे मुकदमों पर लगेगी रोक

सुप्रीम कोर्ट के इस फैसले से अदालतों में झूठे मुकदमों में भारी कमी आएगी। कई बार ब्रेकअप के बाद बदले की भावना से आपराधिक केस दर्ज कराए जाते हैं। अब पुलिस और निचली अदालतों को इन मामलों की जांच ज्यादा सावधानी से करनी होगी। किसी भी व्यक्ति को बिना ठोस सबूत के बेवजह गिरफ्तार या परेशान नहीं किया जा सकेगा। यह फैसला कानूनी प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकने की दिशा में एक बेहद अहम कदम है।

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