Delhi News: सुप्रीम कोर्ट ने देश के नागरिकों के हक में एक बहुत बड़ा और ऐतिहासिक फैसला सुनाया है। अदालत ने फुटपाथ पर सुरक्षित चलने के अधिकार को संविधान के तहत नागरिकों का मौलिक अधिकार घोषित कर दिया है। कोर्ट ने साफ कहा कि सड़क पर गाड़ियों से पहले पैदल यात्रियों का अधिकार है।
शीर्ष अदालत ने अपने आदेश में स्पष्ट किया है कि सुरक्षित फुटपाथ न मिलना नागरिकों के बुनियादी अधिकारों का सीधा हनन है। अगर बुनियादी ढांचे की कमी के कारण किसी नागरिक को नुकसान पहुंचता है, तो वह जिम्मेदार सरकारी अधिकारियों या नागरिक एजेंसियों के खिलाफ कानूनी कार्रवाई करके उचित मुआवजे की मांग कर सकता है।
मासूम की मौत पर आया ऐतिहासिक फैसला
यह ऐतिहासिक फैसला एक बेहद दर्दनाक सड़क हादसे से जुड़ी याचिका पर सुनवाई के दौरान आया है। एक पिता अपने 5 साल के मासूम बच्चे को स्कूल छोड़ने जा रहे थे, तभी एक तेज रफ्तार टैंकर ने बच्चे को कुचल दिया था। इस दर्दनाक हादसे में मासूम की मौके पर ही मौत हो गई थी।
इस हादसे के बाद शुरुआत में 7.82 लाख रुपये का मुआवजा तय हुआ था, जिसे दिल्ली हाईकोर्ट ने घटाकर सिर्फ 4.70 लाख रुपये कर दिया था। सुप्रीम कोर्ट ने अब हाईकोर्ट के उस फैसले को पूरी तरह पलट दिया है। शीर्ष अदालत ने पीड़ित पिता को कुल 11.45 लाख रुपये मुआवजा देने का सख्त आदेश दिया है।
गाड़ियों के आविष्कार से पहले से चल रहा है इंसान
जस्टिस की पीठ ने सुनवाई के दौरान बेहद तल्ख टिप्पणी की। कोर्ट ने पाया कि जिस जगह यह भीषण हादसा हुआ, वहां पैदल चलने वालों के लिए न तो कोई फुटपाथ बना था और न ही कोई पेडेस्ट्रियन क्रॉसिंग (जेब्रा क्रॉसिंग) की व्यवस्था की गई थी। कोर्ट ने सरकारी सिस्टम की लापरवाही पर गहरी नाराजगी जताई।
अदालत ने कहा कि जब तक हम सड़कों के इस्तेमाल के प्रति अपना नजरिया नहीं बदलेंगे, तब तक ऐसे हादसे नहीं रुकेंगे। इंसानी सभ्यता वाहनों के आविष्कार से सदियों पहले से पैदल चल रही है। इसलिए ‘चलने का अधिकार’ सबसे प्राथमिक अधिकार है, जो किसी भी कार या बाइक से कहीं ऊपर है।
Author: Gaurav Malhotra


