West Bengal News: पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में करारी हार के बाद ममता बनर्जी के नेतृत्व वाली टीएमसी गहरे राजनीतिक संकट में फंस गई है। टीएमसी के 20 बागी लोकसभा सांसदों ने पार्टी का साथ छोड़ दिया है। अधिकांश राजनीतिक विश्लेषकों को उम्मीद थी कि ये सभी बागी नेता भारतीय जनता पार्टी में शामिल होंगे।
हालांकि, इन बागी सांसदों ने कानूनी पचड़ों और बड़ी पेचीदगियों से बचने के लिए एक अलग ही रास्ता चुना है। इन्होंने बीजेपी में सीधे एंट्री करने के बजाय त्रिपुरा की एक बेहद छोटी और अनजान राजनीतिक पार्टी ‘नेशनलिस्ट सिटीजन्स पार्टी ऑफ इंडिया’ में अपनी सदस्यता के विलय का एक सुरक्षित फैसला लिया है।
दल बदल कानून से बचने की सोची समझी रणनीति
त्रिपुरा की यह रजिस्टर्ड लेकिन गैर मान्यता प्राप्त राजनीतिक पार्टी अब इन बागियों का नया ठिकाना बन चुकी है। इस छोटे दल की कोई बड़ी राजनीतिक अहमियत नहीं है। यही खूबी इन बागी सांसदों के लिए सबसे मददगार साबित हुई, जिसने उन्हें टीएमसी से बाहर निकलने का कानूनी रास्ता दे दिया।
इस फैसले से बीजेपी को भी बड़ा फायदा हुआ है। बीजेपी को इन लोकसभा सांसदों को तुरंत अपनी पार्टी में शामिल नहीं करना पड़ा। इसके बावजूद बीजेपी को संसद के भीतर इन सभी बागी सदस्यों का पूरा समर्थन मिल जाएगा। इस मास्टरस्ट्रोक से सांसदों की लोकसभा सदस्यता भी पूरी तरह सुरक्षित रहेगी।
संसद के कड़े नियमों के कारण बदलना पड़ा प्लान
राजनीतिक सूत्रों के अनुसार, बागी सांसदों की पहली योजना संसद में एक अलग और स्वतंत्र गुट बनाने की थी। वे दो तिहाई बहुमत के साथ टीएमसी संसदीय दल से अलग होकर एनडीए सरकार को समर्थन देना चाहते थे। लेकिन एंटी डिफेक्शन लॉ यानी दल बदल विरोधी कानून के कारण यह संभव नहीं था।
इस गंभीर तकनीकी अड़चन को देखने के बाद बागी नेताओं ने अपनी पूरी स्ट्रेटजी बदल दी। स्वतंत्र गुट को लोकसभा अध्यक्ष से कानूनी मान्यता मिलने में बड़ी मुश्किल आ सकती थी। इसलिए इस अनजान राजनीतिक दल का सहारा लिया गया, ताकि बिना किसी अड़चन के नई राजनीतिक जमीन तैयार हो सके।
विधानसभा बगावत की गलतियों से सीखा बड़ा सबक
माकपा के वरिष्ठ नेता सुजन चक्रवर्ती ने इस पूरे घटनाक्रम पर तीखा तंज कसा है। उन्होंने कहा कि यह कोई वैचारिक विलय नहीं है। यह सांसदों की अपनी सीट बचाने की विशुद्ध रूप से एक कानूनी तिकड़म है। लोकसभा के ये बागी सांसद उन सभी अदालती विवादों से बचना चाहते थे।
दरअसल, पश्चिम बंगाल विधानसभा के भीतर हुए विद्रोह में विधायकों ने खुद को असली टीएमसी बताया था। इसके कारण वह मामला तुरंत कानूनी दांव पेंच और चुनाव आयोग की लंबी लड़ाई में फंस गया। लोकसभा सांसदों ने इस बार संगठन या चुनाव चिह्न पर अपना कोई दावा नहीं ठोका है।
Author: Sourav Banerjee


