Uttar Pradesh News: इलाहाबाद हाई कोर्ट की लखनऊ खंडपीठ ने सहारा शहर की जमीन से जुड़े विवाद पर एक बड़ा फैसला सुनाया है। अदालत ने इस मामले में दाखिल रिट याचिका पर सुनवाई करने से साफ इनकार कर दिया है। खंडपीठ का तर्क है कि जब एक ही संपत्ति और विवाद का मामला देश की सर्वोच्च अदालत (सुप्रीम कोर्ट) के समक्ष विचाराधीन है, तब हाई कोर्ट समानांतर सुनवाई नहीं कर सकता। कोर्ट ने स्पष्ट किया कि इस स्थिति में उसके हाथ बंधे हुए हैं और वह कोई हस्तक्षेप नहीं करेगा।
नगर निगम के पट्टा निरस्तीकरण आदेश को दी गई थी चुनौती
इस याचिका के माध्यम से लखनऊ नगर निगम के दो महत्वपूर्ण आदेशों को कटघरे में खड़ा किया गया था। पहला आदेश आठ सितंबर 2025 का था, जिसमें सहारा को 1994 में दी गई जमीन का पट्टा निरस्त कर दिया गया था। इसके ठीक बाद ग्यारह सितंबर को नगर निगम ने जमीन खाली कराने का आदेश भी जारी कर दिया था। याचिकाकर्ता का तर्क था कि मध्यस्थता के एक पुराने आदेश के तहत वे पट्टे की राशि जमा करने को तैयार हैं, फिर भी उनकी अनदेखी की गई।
सहारा-सेबी अवमानना मामला बना सुनवाई में बाधा
सुनवाई के दौरान यह तथ्य सामने आया कि सहारा समूह और सेबी के बीच चल रहे विवाद को लेकर सुप्रीम कोर्ट में कई अवमानना याचिकाएं पहले से लंबित हैं। इन याचिकाओं में सहारा की संपत्तियों की स्थिति और उनके उपयोग को लेकर शीर्ष अदालत लगातार निगरानी कर रही है। हाई कोर्ट ने माना कि चूंकि यह विवाद सहारा-सेबी मामले के व्यापक दायरे में आता है, इसलिए निचली अदालतों को इस पर स्वतंत्र निर्णय लेने का अधिकार फिलहाल नहीं है।
अदाणी ग्रुप को संपत्तियां सौंपने की अर्जी पर टिकी नजर
एक बेहद महत्वपूर्ण मोड़ तब आया जब अदालत को बताया गया कि सहारा ने चौदह सितंबर 2025 को सुप्रीम कोर्ट में एक नई अर्जी दी है। इस अर्जी में सहारा ने अपनी कई संपत्तियों को अदाणी ग्रुप को सौंपने की अनुमति मांगी है। सहारा का उद्देश्य इन संपत्तियों की बिक्री से प्राप्त धनराशि को ‘सहारा-सेबी’ खाते में जमा करना है। खास बात यह है कि अदाणी ग्रुप को दी जाने वाली संपत्तियों की सूची में लखनऊ का सहारा शहर भी शामिल है।
पोषणीयता के आधार पर याचिका हुई खारिज
अदालत ने याचिका को पोषणीयता (Maintainability) के स्तर पर ही खारिज कर दिया। खंडपीठ ने अपने फैसले में कहा कि सहारा शहर का विषय सीधे तौर पर सुप्रीम कोर्ट के विचाराधीन है और वहां अंतरिम आदेश भी प्रभावी हैं। ऐसी स्थिति में हाई कोर्ट द्वारा कोई भी आदेश पारित करना कानूनी प्रक्रिया का उल्लंघन होगा। इस फैसले के बाद अब सबकी नजरें सुप्रीम कोर्ट पर टिकी हैं, जहां सहारा की संपत्तियों के भविष्य और अदाणी ग्रुप के साथ होने वाले संभावित सौदे पर फैसला होना है।


