India News: मध्य पूर्व में जारी संकट के बीच भारत की ऊर्जा सुरक्षा को लेकर सवाल उठ रहे हैं। सीएजी की 2025 की ऑडिट रिपोर्ट के अनुसार, रणनीतिक भंडारण सुविधाओं का सालों से पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ है। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने राज्यसभा में भरोसा दिलाया है कि भारत के पास कच्चे तेल का पर्याप्त भंडार है। उन्होंने बताया कि आयात को विविध बनाया गया है और भंडारण को प्राथमिकता दी गई है।
भंडारण क्षमता का 64 फीसदी ही उपयोग
पेट्रोलियम मंत्रीसुरेश गोपी ने राज्यसभा में बताया कि भारत के कच्चे तेल का भंडार कुल क्षमता का लगभग 64 फीसदी है। आंध्र प्रदेश और कर्नाटक में तीन जगहों पर 5.33 मिलियन मीट्रिक टन (एमएमटी) कच्चे तेल को रणनीतिक भंडार में रखने की क्षमता है। इसमें से 3.372 एमएमटी भरा हुआ है, यानी क्षमता का एक-तिहाई से ज्यादा हिस्सा खाली है। इन भंडारों का प्रबंधन इंडियन स्ट्रैटेजिक पेट्रोलियम रिजर्व्स लिमिटेड (आईएसपीआरएल) करती है।
वैश्विक स्तर पर कहां है भारत?
भारत हर महीनेलगभग 20 एमएमटी पेट्रोलियम उत्पादों का उपभोग करता है। वर्तमान स्तर पर रणनीतिक भंडार लगभग पांच दिन के लिए पर्याप्त है। तेल विपणन कंपनियों के पास 64.5 दिन की मांग के बराबर स्टॉक है। आईएसपीआरएल की कुल 9.5 दिन की क्षमता को मिलाकर भारत की कुल भंडारण क्षमता लगभग 74 दिन की है। अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) 90 दिन के आयात के बराबर भंडार रखने की सिफारिश करती है। जापान के पास 208 दिन, दक्षिण कोरिया के पास 200 दिन और चीन के पास लगभग 120 दिन का स्टॉक है।
खाड़ी देशों पर अत्यधिक निर्भरता
भारत कच्चेतेल का दुनिया का तीसरा सबसे बड़ा उपभोक्ता है और अपनी जरूरतों का 88 फीसदी से ज्यादा आयात करता है। 2025 में भारत के कच्चे तेल के आयात का 50 फीसदी से ज्यादा हिस्सा मध्य-पूर्व से आया था, मुख्यतः इराक, सऊदी अरब और संयुक्त अरब अमीरात से। साल 2019 से 2022 के बीच यह निर्भरता 60 फीसदी से भी ऊपर चली गई थी। आईसीआरए के सीनियर वाइस प्रेसिडेंट प्रशांत वशिष्ठ ने बताया कि भारत की भंडारण क्षमता कम है और आयात पर अत्यधिक निर्भरता एक कमजोरी है।
सीएजी ने उठाए सवाल
सीएजीकी रिपोर्ट में कहा गया कि भंडारण क्षमता का पूरा इस्तेमाल नहीं हुआ है। वित्त वर्ष 2024 में, 3.98 एमएमटी क्षमता वाली भूमिगत चट्टानी गुफाओं में सिर्फ 2.91 एमएमटी कच्चा तेल रखा गया था, यानी 27 फीसदी हिस्सा खाली रहा। रिपोर्ट में भंडारण क्षमता बढ़ाने की धीमी प्रगति पर भी सवाल उठाए गए हैं। विशेषज्ञों का कहना है कि वैश्विक संकट के दौरान भंडार बढ़ाना महंगा हो सकता है, इसलिए कम कीमतों पर भंडारण करना बेहतर रणनीति होती है। फिलहाल भारत अपने रणनीतिक भंडार को बढ़ाने और ऊर्जा स्रोतों में विविधता लाने की योजना पर काम कर रहा है।


