हिमाचल में 108 और 102 एंबुलेंस के पहिये थमे, मरीजों की जान सांसत में, सरकार को दिया सबसे बड़ा अल्टीमेटम

Himachal News: हिमाचल प्रदेश में स्वास्थ्य व्यवस्था चरमरा गई है। एक सौ आठ और एक सौ दो एंबुलेंस सेवा के कर्मचारी हड़ताल पर चले गए हैं। यह हड़ताल रविवार रात आठ बजे से शुरू हुई है। कर्मचारियों ने ग्यारह अप्रैल सुबह आठ बजे तक काम बंद रखने की चेतावनी दी है। सोमवार को इन कर्मचारियों ने प्रदेश सचिवालय के बाहर विशाल प्रदर्शन किया। इस राज्यव्यापी हड़ताल से मरीजों की मुश्किलें बहुत बढ़ गई हैं।

आपातकालीन सेवाएं ठप, निजी वाहनों का सहारा

एंबुलेंस कर्मचारियों की हड़ताल से प्रदेश में आपातकालीन सेवाएं बुरी तरह प्रभावित हुई हैं। गंभीर दुर्घटना के शिकार मरीजों को अस्पताल पहुंचने में भारी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। एंबुलेंस सुविधा न मिलने के कारण आम लोग अब निजी गाड़ियों का सहारा ले रहे हैं। ग्रामीण क्षेत्रों के मरीजों को अस्पताल लाने के लिए महंगी टैक्सियों का इस्तेमाल करना पड़ रहा है। गरीब और बेबस मरीजों के लिए यह स्थिति सबसे ज्यादा संकटपूर्ण और जानलेवा बन गई है।

बिना उचित कारण नौकरी से निकाले गए कर्मचारी

हड़ताल कर रहे कर्मचारियों का गुस्सा कंपनी और सरकार दोनों पर फूट रहा है। यूनियन के महासचिव बालकराम ने अपनी मुख्य शिकायतें मीडिया के सामने रखीं। उन्होंने बताया कि कर्मचारी काफी लंबे समय से अपनी लंबित मांगों को उठा रहे हैं। लेकिन प्रशासन लगातार उनकी गंभीर समस्याओं की अनदेखी कर रहा है। हाल ही में पचास कर्मचारियों को बिना किसी उचित कारण के नौकरी से निकाल दिया गया। कर्मचारियों के साथ लगातार भारी मानसिक प्रताड़ना की जा रही है।

आधिकारिक सूचना के बिना कोई समझौता नहीं

वेतन विसंगतियां कर्मचारियों की सबसे बड़ी समस्याओं में से एक हैं। बार-बार आवाज उठाने के बावजूद कंपनी प्रबंधन ने कोई स्थायी समाधान नहीं निकाला है। महासचिव ने बताया कि इस हड़ताल को टालने के लिए कुछ बातचीत जरूर हुई थी। जिला स्तर के कुछ प्रतिनिधियों और कंपनी के बीच एक हल्की चर्चा हुई थी। इसमें कर्मचारियों से हड़ताल पर न जाने का आग्रह किया गया था। लेकिन कंपनी ने राज्य स्तरीय यूनियन को कोई आधिकारिक सूचना नहीं दी।

ग्रामीण इलाकों और गर्भवती महिलाओं की बढ़ी मुश्किलें

यूनियन नेताओं ने बातचीत के तरीके पर अपनी कड़ी आपत्ति जताई है। उनका साफ कहना है कि कंपनी जानबूझकर राज्य स्तरीय यूनियन को दरकिनार कर रही है। जब तक मुख्य कर्मचारी प्रतिनिधियों को वार्ता के लिए नहीं बुलाया जाता, काम बंद रहेगा। यह हड़ताल पूरे प्रदेश में लगातार जारी रहेगी। एंबुलेंस कर्मचारियों ने स्पष्ट किया है कि वे झूठे आश्वासनों पर बिल्कुल भरोसा नहीं करेंगे। सरकार को इस गंभीर मामले में तुरंत कोई ठोस फैसला लेना होगा।

वैकल्पिक व्यवस्थाएं नाकाफी, जान का खतरा बढ़ा

हिमाचल प्रदेश जैसे पहाड़ी राज्य में एंबुलेंस सेवाएं मुख्य जीवन रेखा मानी जाती हैं। एक सौ आठ और एक सौ दो एंबुलेंस सेवाएं आपातकालीन चिकित्सा का मुख्य आधार हैं। इन सेवाओं के रुकने से गर्भवती महिलाओं को अस्पतालों तक पहुंचने में भारी दिक्कत हो रही है। ग्रामीण और दुर्गम इलाकों में मरीजों के लिए दूसरा सुरक्षित विकल्प मौजूद नहीं है। समय पर सही इलाज न मिलने से कई गंभीर मरीजों की जान को सीधा खतरा पैदा हो गया है।

उपायुक्तों को दिए गए सख्त निर्देश बेअसर

राज्य सरकार ने गंभीर स्थिति से निपटने के लिए कुछ अहम और फौरी कदम उठाए हैं। स्वास्थ्य विभाग ने सभी उपायुक्तों को स्थिति पर नजर रखने के सख्त निर्देश दिए हैं। प्रशासन को एंबुलेंस की जगह अन्य विकल्पों के तौर पर वाहन उपलब्ध कराने को कहा गया है। हालांकि सरकार के इन आदेशों के बावजूद जमीनी स्तर पर स्वास्थ्य सेवाएं पूरी तरह ठप हैं। मरीजों को इन सरकारी वैकल्पिक व्यवस्थाओं का कोई बड़ा लाभ नहीं मिल पा रहा है।

प्रदेश सचिवालय के बाहर गूंजे विरोध के कड़े स्वर

प्रदेश सचिवालय के बाहर सोमवार को हुए प्रदर्शन में राज्य भर से कर्मचारी शामिल हुए। उन्होंने सरकार और कंपनी प्रबंधन के खिलाफ जमकर अपनी भड़ास निकाली। प्रदर्शनकारी कर्मचारियों ने अपनी मांगों का एक ज्ञापन भी सरकारी अधिकारियों को सौंपा है। वे अपनी नौकरी की सुरक्षा और उचित वेतन की मांग कर रहे हैं। कर्मचारियों का मनोबल बहुत ऊंचा है और वे अपनी मांगों के पूरा होने तक पीछे हटने के मूड में बिल्कुल भी नजर नहीं आ रहे हैं।

गतिरोध न सुलझने पर हालात होंगे पूरी तरह बेकाबू

यह स्वास्थ्य संकट आने वाले दिनों में और गहरा सकता है। ग्यारह अप्रैल तक सरकार और कर्मचारियों के बीच ठोस समझौता नहीं होने पर हालात बेकाबू होंगे। स्वास्थ्य विशेषज्ञ चेतावनी दे रहे हैं कि आपातकालीन व्यवस्था चरमराने से मृत्यु दर तेजी से बढ़ सकती है। आम जनता भी इस लंबी हड़ताल के कारण प्रशासन और राज्य सरकार से बहुत नाराज है। सरकार पर इस गंभीर गतिरोध को जल्द सुलझाने का भारी राजनीतिक और सामाजिक दबाव है।

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