दिल्ली में मौत का ‘डेथ ट्रैप’ बनीं नहरें और यमुना के घाट: गर्मी से राहत पाने की चाहत छीन रही मासूमों की जिंदगी

Delhi News: राजधानी दिल्ली में गर्मी का पारा चढ़ते ही मासूम बच्चों की जान पर बन आई है। तपिश से राहत पाने के लिए बच्चे चोरी-छिपे यमुना के घाटों और मुनक नहर का रुख कर रहे हैं। पिछले साल डूबने से करीब 89 लोगों की मौत हुई थी, जिनमें बड़ी संख्या बच्चों की थी। विडंबना यह है कि इनमें से 95 फीसदी बच्चों को तैरना नहीं आता था। ये बच्चे घर पर बिना बताए दोस्तों के साथ ग्रुप बनाकर खतरनाक पानी में उतर जाते हैं।

मुनक नहर और यमुना के असुरक्षित घाट दे रहे हादसों को दावत

मुनक नहर के किनारे सुरक्षा दीवार या बाड़ न होना हादसों का सबसे बड़ा कारण है। पिछले साल इस नहर में डूबने का आंकड़ा 100 के करीब पहुंच गया था। तेज बहाव के कारण डूबे हुए लोगों के शव अक्सर हैदरपुर वॉटर ट्रीटमेंट प्लांट के जाल में फंसे मिलते हैं। सरकार ने इस नहर के कुछ हिस्सों को कवर करने की योजना बनाई थी, लेकिन अब भी पल्ला से लेकर ओखला तक यमुना के घाटों पर सुरक्षा इंतजाम शून्य ही नजर आते हैं।

बोट क्लब और फायर सर्विस की टीमें बचा रही हैं जिंदगियां

राजधानी में डूबने की सूचना मिलते ही बोट क्लब और दिल्ली फायर सर्विस के गोताखोर सक्रिय हो जाते हैं। पिछले साल बोट क्लब की टीम ने लगभग 80 लोगों को सुरक्षित मौत के मुंह से बाहर निकाला था। इसी अप्रैल महीने में दिल्ली फायर सर्विस ने 8 शव बरामद किए और आधा दर्जन से ज्यादा लोगों को बचाया है। सीमित संसाधनों के बावजूद ये गोताखोर नालों और गहरी नहरों में सर्च ऑपरेशन चलाकर लोगों की जान बचाने के लिए कड़ी मशक्कत कर रहे हैं।

निचले तबके के बच्चे और कामकाजी माता-पिता पर सबसे ज्यादा असर

हादसों के शिकार होने वाले अधिकांश बच्चे लेबर क्लास परिवारों से आते हैं, जिनके माता-पिता नौकरी पर होते हैं। बच्चे स्कूल की छुट्टी के बाद गर्मी से बचने के लिए नहरों का रुख करते हैं। जांच में सामने आया है कि इन बच्चों को पानी की गहराई का अंदाजा नहीं होता। जब तक परिवार को जानकारी मिलती है, तब तक काफी देर हो चुकी होती है। विभाग की ओर से चेतावनी बोर्ड और गश्त की कमी इस समस्या को और भी गंभीर बना देती है।

स्कूल और एनजीओ की भागीदारी से रुकेंगे दर्दनाक हादसे

जानकारों का मानना है कि इन हादसों को रोकने के लिए स्कूलों में शिक्षकों को विशेष जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। एनजीओ को इलाकों में नुक्कड़ नाटक करके बच्चों और अभिभावकों को पानी के खतरों के प्रति सचेत करना होगा। पुलिस और बाढ़ नियंत्रण विभाग को यमुना और नहरों के आसपास गश्त बढ़ानी चाहिए। जब तक सामूहिक प्रयास नहीं होंगे, तब तक मासूमों को इन ‘डेथ ट्रैप’ से बचाना मुश्किल होगा।

बारिश के पानी से भरे गड्ढे और जौहड़ भी बन रहे काल

सिर्फ नहरें ही नहीं, बल्कि बाहरी दिल्ली के खुले मैदानों में बारिश के बाद जमा पानी भी जानलेवा साबित हो रहा है। पिछले साल प्रहलादपुर इलाके के एक गड्ढे में डूबने से तीन किशोरों की मौत हो गई थी। जलभराव वाले ये गड्ढे और पुराने जौहड़ हादसों का मुख्य कारण बन रहे हैं। प्रशासन को इन खुले गड्ढों को भरने और असुरक्षित जलाशयों के चारों तरफ सुरक्षा घेरा बनाने की सख्त जरूरत है।

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