Lifestyle News: स्कूल बच्चों की पढ़ाई के साथ उनके व्यक्तित्व और आत्मविश्वास को भी गढ़ता है। लेकिन आजकल स्कूलों में बढ़ती बुलिंग की घटनाएं बच्चों के मानसिक विकास को बुरी तरह प्रभावित कर रही हैं। कई बार बच्चे इस डर को अंदर ही अंदर दबा लेते हैं, जिससे उनका आत्मसम्मान खत्म होने लगता है।
बुलिंग का मतलब किसी बच्चे को जानबूझकर बार-बार शारीरिक या मानसिक रूप से परेशान करना है। इसमें चिढ़ाना, मारपीट, गाली-गलौज, डराना या सोशल मीडिया पर मजाक उड़ाना शामिल है। यह प्रताड़ना इतनी गंभीर हो सकती है कि बच्चा डिप्रेशन का शिकार होकर आत्मघाती कदम तक उठा लेता है।
माता-पिता और शिक्षकों को बच्चों के व्यवहार में आने वाले बदलावों को बहुत बारीकी से देखना चाहिए। यदि आपका हंसता-खेलता बच्चा अचानक शांत रहने लगे, चिड़चिड़ा हो जाए या दोस्तों से दूरी बना ले, तो यह बुलिंग का एक बहुत बड़ा और शुरुआती संकेत हो सकता है।
इन संकेतों से पहचानें बच्चे का दर्द
अगर बच्चा रोजाना पेट दर्द या सिरदर्द का बहाना बनाकर स्कूल जाने से कतराने लगे, तो सतर्क हो जाएं। इसके अलावा शरीर पर रहस्यमयी चोट के निशान, फटे कपड़े या स्कूल के सामान का बार-बार खो जाना भी इस बात का इशारा है कि उसके साथ कुछ गलत हो रहा है।
बुलिंग का सीधा असर बच्चे की पढ़ाई और सेहत पर भी पड़ता है। अचानक से मार्क्स कम होना, क्लास में ध्यान न भटकना, रात में डरावने सपने आना, नींद न आना और भूख कम लगना इसके मुख्य लक्षण हैं। ऐसे में बच्चा खुद को हर बात के लिए दोषी मानने लगता है।
पेरेंट्स और टीचर्स तुरंत उठाएं ये कदम
इस संकट से बच्चे को निकालने के लिए पेरेंट्स रोज उनसे खुलकर बात करें। उन्हें यह भरोसा दिलाएं कि वे सुरक्षित हैं और अपनी हर बात साझा कर सकते हैं। स्कूल प्रबंधन से मिलकर वहां की एंटी-बुलिंग पॉलिसी के बारे में जानें और शिक्षकों को पूरी स्थिति से अवगत कराएं।
बच्चों को बचपन से ही आत्मरक्षा और गलत व्यवहार के खिलाफ आवाज उठाने की ट्रेनिंग दें। अगर बच्चा बहुत ज्यादा डरा हुआ या मानसिक तनाव में है, तो बिना देर किए किसी प्रोफेशनल चाइल्ड काउंसलर या थेरेपिस्ट की मदद लें ताकि उसका आत्मविश्वास वापस लौट सके।
Author: Karuna Sen


