New Delhi News: अमेरिकी पत्रकारों मैगी हबरमैन और जोनाथन स्वान की नई किताब में डोनाल्ड ट्रंप के कार्यकाल से जुड़ी अहम जानकारी सामने आई है। इस किताब के मुताबिक, एक समय यूक्रेन-रूस युद्ध को रोकने के लिए ट्रंप प्रशासन के भीतर भारतीय शांति सैनिकों को यूक्रेन भेजने का प्रस्ताव रखा गया था, जिसे ट्रंप ने सिरे से खारिज कर दिया था।
ट्रंप को था भारत के रुख का पूरा अंदाजा
किताब में बताया गया है कि उपराष्ट्रपति जे डी वैंस ने शांति सेना के तौर पर नाटो की जगह भारतीय सैनिकों को तैनात करने का सुझाव दिया था। हालांकि, ट्रंप ने साफ कहा कि वे भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और उनकी सरकार को अच्छी तरह जानते हैं। ट्रंप को पक्का यकीन था कि भारत किसी भी हाल में इस प्रस्ताव को नहीं मानेगा।
किसी दबाव में नहीं झुकती भारत की नीति
भारत की विदेश नीति अब पश्चिमी देशों के प्रभाव से पूरी तरह स्वतंत्र है। यूक्रेन संकट के दौरान भी भारत ने अमेरिका और पश्चिमी जगत के दबाव को दरकिनार कर अपने राष्ट्रीय हितों को सर्वोपरि रखा। भारत ने रूस से तेल का व्यापार जारी रखा, लेकिन साथ ही हर मंच पर युद्ध को रोकने और कूटनीति का आग्रह भी किया है।
क्या है भारतीय शांति सेना का प्रोटोकॉल?
भारत किसी भी दो देशों के आपसी टकराव में सीधे शांति सेना नहीं भेजता है। भारतीय सेना का प्रोटोकॉल कहता है कि जवान केवल संयुक्त राष्ट्र (यूएन) के झंडे के तहत ही अंतरराष्ट्रीय मिशनों में तैनात किए जा सकते हैं। शांति मिशन में भागीदारी तभी संभव होती है जब वहां मानवाधिकारों का गंभीर हनन हो रहा हो, न कि युद्ध के समाधान के लिए।
ट्रंप जानते हैं भारत को झुकाना है नामुमकिन
ट्रंप यह भली-भांति समझते हैं कि भारत को अपनी नीतियों के लिए झुकाया नहीं जा सकता है। सीमा पर चीन और पाकिस्तान जैसी चुनौतियों के बावजूद भारत अपनी सामरिक स्वायत्तता बनाए रखने में सक्षम है। ट्रंप की यह समझ और भारत को लेकर उनका नजरिया इस किताब में स्पष्ट रूप से दर्ज किया गया है, जो काफी चर्चा का विषय बनी हुई है।

