India News: महिलाओं में पीरियड्स के दौरान मूड स्विंग होना एक आम लेकिन परेशान करने वाली समस्या है। हॉर्मोनल बदलाव के कारण महिलाएं कभी बहुत खुश तो कभी अचानक उदास महसूस करती हैं। कई बार यह स्थिति इतनी गंभीर हो जाती है कि मानसिक तनाव और आत्महत्या जैसे नकारात्मक विचार तक मन में आने लगते हैं।
विशेषज्ञों के अनुसार, यह समस्या मुख्य रूप से एस्ट्रोजन और अन्य हॉर्मोन में होने वाले उतार-चढ़ाव से जुड़ी होती है। पीरियड्स के दौरान कमर दर्द, ब्लोटिंग और थकान जैसी शारीरिक परेशानियां भी मिजाज को बदलने में बड़ी भूमिका निभाती हैं। किशोरावस्था से लेकर मेनोपॉज तक, हर उम्र में महिलाओं को इससे जूझना पड़ता है।
किन पड़ावों पर ज्यादा प्रभावित होता है मूड?
किशोरावस्था (10-15 वर्ष) के दौरान जब पहली बार पीरियड्स शुरू होते हैं, तो शरीर में बड़े बदलाव होते हैं। इस उम्र में हॉर्मोनल असंतुलन के कारण चिड़चिड़ापन और उदासी होना स्वाभाविक है। वहीं, प्रेग्नेंसी और डिलीवरी के बाद की थकान और नई जिम्मेदारियां भी महिलाओं के मानसिक स्वास्थ्य और मूड को बुरी तरह प्रभावित करती हैं।
मेनोपॉज यानी 40-45 वर्ष की आयु के बाद हॉर्मोन का स्तर, विशेषकर एस्ट्रोजन, अनियंत्रित हो जाता है। इस दौरान मूड में अत्यधिक बदलाव देखे जाते हैं। शरीर में ऊर्जा की कमी, नींद न आना, बेचैनी, आत्मविश्वास में गिरावट और चीजों को भूलने जैसी समस्याएं भी मूड स्विंग के मुख्य लक्षणों के रूप में उभरकर सामने आती हैं।
कैसे पाएं इस स्थिति से राहत?
अगर आप भी पीरियड्स में मूड स्विंग से परेशान हैं, तो अपने आसपास का वातावरण खुशनुमा रखें। तनावमुक्त रहने के लिए ऐसी जगह का चुनाव करें जो आपको शांति दे। अपनी डाइट में हरी सब्जियों और ताजे फलों को प्राथमिकता दें। खान-पान में सुधार करने से शरीर को जरूरी पोषण मिलता है, जो मन को शांत रखता है।
योग और सुबह की सैर को अपनी दिनचर्या का हिस्सा बनाएं। सबसे महत्वपूर्ण उपाय है पर्याप्त पानी पीना। अधिक पानी पीने से हॉर्मोन नियंत्रित रहते हैं और मूड स्विंग को कम करने में बड़ी मदद मिलती है। इस दौरान खुद को हाइड्रेटेड रखना न भूलें, क्योंकि यह शारीरिक और मानसिक स्वास्थ्य के लिए बेहद जरूरी है।
Author: Asha Thakur

