विटामिन A की कमी और फास्ट फूड छीन रहा आंखों का नूर: एम्स विशेषज्ञ से जानिए कैसे बचाएं अपनी रोशनी

Health News: भागदौड़ भरी जिंदगी और खान-पान में लापरवाही अब युवाओं की आंखों के लिए बड़ा खतरा बन रही है। एम्स, नई दिल्ली के आरपी सेंटर की विशेषज्ञ प्रो. डॉ. नम्रता शर्मा के अनुसार, संतुलित आहार की कमी और फास्ट फूड कल्चर के कारण बच्चों और युवाओं में विटामिन A की भारी कमी देखी जा रही है। इससे आंखों का सूखापन, रात में कम दिखना (रतौंधी) और कार्निया का सफेद होना जैसी गंभीर समस्याएं बढ़ रही हैं। समय पर इलाज न मिलने से यह अंधापन का कारण भी बन सकता है।

विटामिन A की कमी और बच्चों की आंखों पर प्रभाव

पोषण की कमी का सबसे सीधा असर आंखों की कार्निया पर पड़ता है। विटामिन A की कमी से कार्निया में कोलेजन बनाने की क्षमता घट जाती है, जिससे पुतली सफेद होने लगती है। बच्चों में यह समस्या तेजी से बढ़ती है, जो उन्हें अंधेपन की ओर धकेल सकती है। इससे बचाव के लिए बचपन से ही आहार में हरी सब्जियां, गाजर और पीले फल जैसे पोषक तत्वों को शामिल करना अनिवार्य है। प्रारंभिक लक्षणों को पहचानकर तुरंत विशेषज्ञ की सलाह लेना रोशनी बचाने के लिए जरूरी है।

एलर्जी और गर्मी से आंखों में लालपन की समस्या

गर्मियों के मौसम में चलने वाली शुष्क हवाएं आंखों की नमी सोख लेती हैं, जिससे आंखों में लालपन और खुजली होने लगती है। डॉ. शर्मा के अनुसार, यह अक्सर एलर्जिक कारणों से होता है। यदि आंखों के लाल होने के साथ-साथ पानी आने या तेज खुजली की समस्या हो, तो इसे अनदेखा करना नुकसानदायक हो सकता है। ऐसे में बार-बार आंखों को रगड़ने के बजाय नेत्र रोग विशेषज्ञ से जांच करानी चाहिए ताकि किसी गंभीर संक्रमण से बचा जा सके।

चश्मे का बढ़ता नंबर और लेसिक सर्जरी का विकल्प

20 से 22 साल की उम्र तक बच्चों की शारीरिक वृद्धि के साथ आंखों का आकार भी बदलता है, जिससे चश्मे का नंबर बढ़ सकता है। मायोपिया यानी निकट दृष्टि दोष के मामलों में कभी-कभी पर्दे (रेटिना) में छेद होने का खतरा रहता है, जिसे लेजर तकनीक से ठीक किया जा सकता है। एक बार उम्र स्थिर होने पर लेसिक (LASIK) सर्जरी के जरिए चश्मा पूरी तरह हटाया जा सकता है। यह एक सुरक्षित और आधुनिक विधि है जो दृष्टि को सामान्य कर देती है।

मोतियाबिंद सर्जरी के बाद धुंधलापन और डायबिटीज

अक्सर मोतियाबिंद के ऑपरेशन के बाद भी मरीजों को साफ नहीं दिखता। डॉ. शर्मा बताती हैं कि खासकर डायबिटीज के मरीजों में शुगर अनियंत्रित होने से पर्दे (रेटिना) में विकार आने लगता है। कई बार सर्जरी के बाद आंखों की झिल्ली मोटी हो जाती है, जिसे साधारण लेजर प्रक्रिया से ठीक किया जा सकता है। मधुमेह के रोगियों को अपनी आंखों की नियमित जांच करानी चाहिए क्योंकि शुगर का सीधा असर आंखों की नसों और पर्दे पर पड़ता है।

मोबाइल का अत्यधिक उपयोग और डिजिटल आई स्ट्रेन

देर रात तक मोबाइल का उपयोग करने से सुबह सोकर उठने पर आंखों में भारीपन, धुंधलापन और पानी आने की समस्या आम हो गई है। डिजिटल स्क्रीन से निकलने वाली नीली रोशनी आंखों की मांसपेशियों को थका देती है। विशेषज्ञों की सलाह है कि सुबह उठने पर आंखों को ठंडे पानी से धोएं और मोबाइल का सीमित उपयोग करें। यदि दृष्टि में चमकीले बिंदु या बादल जैसा धुंधलापन दिखाई दे, तो यह रेटिना की समस्या हो सकती है जिसकी तुरंत जांच जरूरी है।

आंखों की टीबी और कार्निया प्रत्यारोपण की सावधानी

आंखों की टीबी एक गंभीर नेत्र दोष है जो अंधेपन का बड़ा कारण बनती है। इसका पूरा इलाज कराना बेहद जरूरी है क्योंकि यह मोतियाबिंद की जटिलताएं भी पैदा कर सकता है। वहीं, जिन मरीजों का कार्निया प्रत्यारोपण (Transplant) हुआ है, उन्हें बीपी और शुगर पर नियंत्रण रखना चाहिए। बिना डॉक्टरी सलाह के किसी भी आई ड्रॉप का इस्तेमाल घातक हो सकता है। कार्निया में सफेद माढ़ा या घाव होने पर तुरंत ट्रांसप्लांट की संभावनाओं पर विशेषज्ञ से बात करनी चाहिए।

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